रामवरदायिनी मंदिराची आख्यायिका अशी की पूर्वी येथे घनदाट जंगल होते. त्यात अतिबळ आणि महाबळ नावाचे न राक्षस राहतहोते. यादोघांचीयेथेदहशतहोती. त्यांचावधकरण्यासाठीदेवांनीदोविष्णूकडेधावघेतली. विष्णूबरोबरझालेल्यायुद्धातअतिबळमारलागेला; परंतुमहाबळाचामात्रविष्णूलावधकरताआलानाही. म्हणूनसर्वदेवांनीआदिशक्तीलामहाबळाचावधकरण्याचीविनंतीकेली. त्यानुसारआदिशक्तीनेमहाबळावरआपलीमोहिनीटाकली. आदिशक्तीच्यामोहिनीतदंगअसलेल्यामहाबळानेआपणसर्वदेवांपेक्षाश्रेष्ठआहोत, त्यामुळेदेवांनीमाझ्याकडेवरमागावा, असेसांगितले. त्यानुसारदेवांनीत्याचामृत्यूव्हावा, असावरमागितला. महाबळानेनाईलाजानेतोमान्यकेला, पणत्याचवेळीत्यानेहीदेवांकडेएकवरमागितलातोअसाकीमीपर्वतरूपातयेथेचवास्तव्यकरेनआणित्यापर्वतावरआदिशक्तीनेवास्तव्यकरावे. देवांनीत्याचीइच्छामान्यकरूनयेथीलकोयनानदीच्यातीरावरआदिशक्तीचीस्थापनाकेली. तीचयामंदिरातीलवरदायिनीदेवीहोय.
जावली की घाटी महाराष्ट्र के इतिहास में प्रसिद्ध है। छत्रपति शिवाजी महाराज के हिंदवी स्वराज्य में इस घाटी का अत्यंत प्रमुख स्थान था। प्रतापगढ़ की तलहटी में अर्थात जावली घाटी में ही शिवाजी महाराज ने अफजल खान का वध किया था। यह स्थान जितना ऐतिहासिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है, उतना ही धार्मिक दृष्टि से भी यह स्थल विशेष महत्त्व रखता है। प्रतापगढ़ की तलहटी से कुछ दूरी पर स्थित पार गाँव में आदिशक्ति रामवरदायिनी देवी का मंदिर महाराष्ट्र के प्रमुख जागृत स्थानों में से एक माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि इस देवी की स्थापना स्वयं श्रीराम ने की थी।
सह्याद्रि की गोद में और घने वनों से घिरे पार गाँव का प्राचीन नाम पार्वतीपुर था। दैनिक व्यवहार में सुविधा हेतु इस नाम के प्रथम और अंतिम अक्षर लेकर “पार” नाम प्रचलित हुआ। पार्वतीपुर से पार नाम कब पड़ा, इसका निश्चित उल्लेख नहीं मिलता। परंतु इस गाँव का उल्लेख अनेक ऐतिहासिक दस्तावेज़ों में मिलता है। यहाँ श्रीराम द्वारा रामवरदायिनी देवी की स्थापना का उल्लेख संत एकनाथ महाराज ने भावार्थ रामायण के ‘अरण्यकांड’ में किया है। श्रीधर स्वामी ने भी रामविजय ग्रंथ में इसका वर्णन किया है। ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार, शिवाजी महाराज के अनुरोध पर समर्थ रामदास स्वामी सज्जनगढ़ पर निवास हेतु आए थे। उसी समय वे इस श्रीरामवरदायिनी देवी के दर्शन हेतु पार्वतीपुर गाँव आए। देवी के चरणों में उन्होंने स्वर्ण पुष्प अर्पित किए। उन्होंने नेत्र बंद कर उनके अनुग्रह का आवाहन किया। श्रद्धालुओं की सभी इच्छाएँ पूर्ण करने वाली इस देवी के सम्मुख समर्थ स्वामी ने हिंदवी स्वराज्य के उत्कर्ष का वर माँगा था।
रामवरदायिनी मंदिर की एक कथा के अनुसार, पूर्वकाल में यहाँ घना जंगल था। इसमें अतिबल और महाबल नामक दो राक्षस निवास करते थे। इन दोनों का यहाँ बड़ा आतंक था। उनके विनाश के लिए देवगणों ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की। भगवान विष्णु के साथ हुए युद्ध में अतिबल मारा गया, परंतु महाबल का वध उनसे नहीं हो सका। तब सभी देवताओं ने आदिशक्ति से महाबल का संहार करने की प्रार्थना की। तब आदिशक्ति ने महाबल पर अपनी मोहिनी डाली। मोहिनी से मोहित होकर महाबल ने कहा कि वह सभी देवताओं से श्रेष्ठ है, इसलिए देवता उससे वर माँगें। देवताओं ने उससे उसकी मृत्यु का वर माँगा। विवश होकर महाबल ने यह वरदान स्वीकार किया। साथ ही उसने भी एक वर माँगा कि वह पर्वत रूप में यहाँ निवास करे और उसी पर्वत पर आदिशक्ति का भी वास हो। देवताओं ने यह वर स्वीकार किया। उन्होंने कोयना नदी के तट पर आदिशक्ति की स्थापना की। वही इस मंदिर में प्रतिष्ठित वरदायिनी देवी हैं।
एक अन्य कथा के अनुसार, रावण द्वारा अपहरण के बाद सीता की खोज करते समय श्रीराम की परीक्षा लेने हेतु माता पार्वती ने सीता का रूप धारण किया। वे उनके सम्मुख प्रकट हुईं, परंतु श्रीराम ने माता पार्वती का वास्तविक स्वरूप पहचान लिया। उन्होंने विनम्रतापूर्वक कहा, “हे माता, आप व्यर्थ ही कष्ट क्यों उठा रही हैं?” तब माता पार्वती प्रसन्न हुईं। उन्होंने श्रीराम को उनके कार्य में सफलता का आशीर्वाद दिया और वे अंतर्धान हो गईं। तत्पश्चात श्रीराम ने इसी स्थान पर उनकी स्थापना की। श्रीराम को वर देने वाली होने के कारण वह रामवरदायिनी नाम से प्रसिद्ध हुईं। यद्यपि दोनों कथाएँ भिन्न हैं, तथापि उनसे इस मंदिर की प्राचीनता और महिमा स्पष्ट रूप से ज्ञात होती है।
महाबलेश्वर-पोलादपुर मार्ग पर प्रतापगढ़ किले से पहले कुंभरोशी गाँव पड़ता है। इसी मार्ग पर एक कमान है। इसके भीतर से पार गाँव की ओर जाया जा सकता है। कमान से लगभग चार किलोमीटर की दूरी पर आदिशक्ति रामवरदायिनी देवी का मंदिर स्थित है। पूर्वकालीन काले पत्थर के मंदिर का जीर्णोद्धार कुछ वर्ष पूर्व किया गया था। इससे मंदिर को वर्तमान स्वरूप प्राप्त हुआ। पूर्वाभिमुख इस मंदिर के चारों ओर प्राचीर है। मंदिर परिसर अत्यंत स्वच्छ व सुव्यवस्थित रखा गया है। मंदिर प्रांगण में छत्रपति शिवाजी महाराज की मूर्ति स्थापित की गई है। इसके अतिरिक्त दीपमाला, मानाई देवी तथा झोलाई देवी के छोटे-छोटे मंदिर हैं। मंदिर का सभामंडप विशाल है। यहाँ से कुछ सीढ़ियाँ चढ़कर गर्भगृह में प्रवेश किया जा सकता है। यहाँ का गर्भगृह और देवी का स्थान प्राचीन काल का ही है। गर्भगृह में सिंहासन पर दो पाषाण मूर्तियाँ हैं। इनमें बाईं ओर ढाई पद ऊँची श्री वरदायिनी देवी की पाषाण मूर्ति और दाईं ओर तीन पद ऊँची श्रीरामवरदायिनी की पाषाण मूर्ति विराजित है।
आदिशक्ति श्रीरामवरदायिनी देवी का यह स्थल महाराष्ट्र के जागृत शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। रामवरदायिनी देवी अनेक प्रतिष्ठित परिवारों की कुलदेवी हैं। इसलिए यहाँ सदैव श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है। बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए मंदिर ट्रस्ट द्वारा भक्तनिवास की व्यवस्था की गई है।
चैत्र वद्य त्रयोदशी से वैशाख शुद्ध षष्ठी तक यहाँ वार्षिक मेला आयोजित होता है। मेले के तीसरे दिन अर्थात चैत्र अमावस्या को आसपास के गाँवों से उनके ग्रामदेवता ‘गुड़ी’ (काठी रूप में) लेकर मंदिर परिसर में लाए जाते हैं। श्रीरामवरदायिनी देवी मंदिर के प्रांगण में एक प्राचीन वृक्ष है। वहीं पर रथ उत्सव होता है। मेले के अंतिम दिन निकाली जाने वाली शोभायात्रा को छबीना कहा जाता है। इस दिन प्रातः पाँच बजे देवी की मूर्ति पालकी में रखकर वाद्ययंत्रों के साथ गाँव में भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है। तत्पश्चात मंदिर में लघुरुद्राभिषेक और होम-हवन आदि विविध धार्मिक कार्यक्रम संपन्न होते हैं। नवरात्रि में घटस्थापना के पश्चात अगले नौ दिनों तक देवी का उत्सव अत्यंत भव्य रूप से मनाया जाता है।
मंदिर के अतिरिक्त इस क्षेत्र की विशेषता यह है कि पार अथवा पार्वतीपुर गाँव शिवकाल से ही वाणिज्य, वस्त्र और आवश्यक वस्तुओं के प्रमुख बाजार के रूप में प्रसिद्ध रहा है। यह गाँव पेठपार, पारपार और सोंडपार नामक तीन बस्तियों में विभाजित है। यह क्षेत्र अत्यंत मनोहर है। पार गाँव के समीप ही कोयना नदी की ओर जाने वाले मार्ग पर शिवाजी महाराज द्वारा निर्मित मजबूत पत्थर का लंबा-चौड़ा पुल स्थित है। चार मेहराबों वाला यह पुल १६ मीटर लंबा और ६ मीटर चौड़ा है। यह पत्थर का पुल आज भी उत्कृष्ट स्थिति में है। इस पर बस और ट्रक जैसे भारी वाहन भी गुजरते हैं। इस पुल के निर्माण से पूर्व जिस गणेश मूर्ति की शिवाजी महाराज स्वयं पूजा करते थे, वह छोटी गणेश मूर्ति आज भी यहाँ देखी जा सकती है।
मुख्य विशेषताएँ
महाबलेश्वर से ४४ किलोमीटर दूरी पर
प्रतापगढ़ की तलहटी से ९ किलोमीटर दूरी पर
महाबलेश्वर से गाँव तक राज्य परिवहन की सुविधा उपलब्ध
निजी वाहन मंदिर की वाहनततल तक जा सकते हैं
भक्तनिवास के कारण निवास की सुविधा उपलब्ध है, पर जलपान की सुविधा नहीं है
संपर्क: मंदिर ट्रस्ट कार्यालय – ९४२०७७१५०९, ७५८८०५९३१८, ९४०४७३४३२०