सतारा शहर से कुछ दूरी पर देगाँव के समीप स्थित पहाड़ी पर पाटेश्वर महादेव का प्राचीन मंदिर तथा गुफा समूह है। घने प्राकृतिक वातावरण से घिरे इस परिसर में पाटेश्वर मंदिर के साथ ही ‘वरहाडघर’ गुफाएँ हैं। इन गुफाओं में धारालिंग, एकमुखी लिंग, नंदी की पीठ पर स्थित शिवलिंग तथा दुर्लभ सहस्रलिंगी शिवलिंग है। इसके अतिरिक्त यहाँ की एक प्रमुख विशेषता ‘अग्निवृष’ पाषाण मूर्ति है। यह मानव और नंदी का संयुक्त रूप है। सम्मुख से देखने पर यह दाढ़ी वाले मनुष्य के रूप में दिखाई देती है। बगल से देखने पर नंदी का रूप दृष्टिगोचर होता है।
सतारा शहर के पास स्थित देगाँव से लगभग ७ किमी की दूरी पर यह पाटेश्वर स्थान स्थित है। यहाँ ४ किमी की दूरी तक पक्की सड़क है। उसके बाद पहाड़ी मार्ग से पैदल चढ़ाई करनी होती है। सीढ़ियों के आरंभ में ही गणेश जी की उत्कीर्ण पाषाण मूर्ति दिखाई देती है। लगभग आधे घंटे की पदयात्रा के बाद पाटेश्वर पर्वत के शिखर, जिसे स्थानीय भाषा में ‘डोंगरमाथा’ कहते हैं, वहाँ स्थित एक विशाल सरोवर तक पहुँचा जा सकता है। इस तालाब को ‘विश्वेश्वर तालाब’ कहा जाता है। इसमें विभिन्न सप्तवर्णीय कमल के पुष्प खिले हुए दिखाई देते हैं। तालाब के पश्चिम की ओर एक प्राचीन गुफा है। इसमें एक अद्वितीय शिवलिंग स्थापित है। इस शिवलिंग की वज्रपीठिका पर शिवलिंग के स्थान पर नंदी की आकृति बनी है। यह आकृति बैठी हुई मुद्रा में है। इसका सिर ज़मीन की ओर झुका हुआ है। स्थानीय लोग इसे ‘मरगल महैसा’ कहते हैं। नंदीधारी शिवलिंग के कारण इस स्थान को प्रारंभ में ‘पाठेश्वर’ कहा जाता था। समय के साथ इस तीर्थ क्षेत्र की पहचान ‘पाटेश्वर’ के रूप में स्थापित हुई।
विश्वेश्वर तालाब के आगे दाहिनी ओर लगभग १०० सीढ़ियाँ चढ़कर पाटेश्वर मंदिर के प्रांगण में पहुँचा जाता है। इस सीढ़ी-मार्ग के दोनों ओर स्थित सुरक्षा-दीवारों में देवकोष्टक निर्मित हैं। इनमें विविध पाषाण मूर्तियाँ स्थापित हैं। पाटेश्वर मंदिर के सम्मुख नंदीमंडप है। इसमें विशिष्ट रूप से नक्काशीयुक्त नंदी की पाषाण मूर्ति है। मंदिर के दोनों ओर दीपमालाएँ हैं। सभामंडप में वैनायकी (स्त्री रूपी गणपति), सरस्वती एवं शेषशायी विष्णु की पाषाण मूर्तियाँ हैं। गर्भगृह में स्थित शिवलिंग अखंड पाषाण का तथा विशाल आकार का है। मुख्य मंदिर के अतिरिक्त मंदिर परिसर में महिषासुरमर्दिनी, भैरव तथा चतुर्मुख भैरव के भी मंदिर हैं। पाटेश्वर मंदिर के दर्शन कर पुनः विश्वेश्वर तालाब पर लौटने पर, वहाँ से पूर्व दिशा में जाने वाला मार्ग दिखाई देता है। उस मार्ग पर आगे बढ़ने पर एक गुफा समूह मिलता है। इसे ‘कोटिलिंग मंदिर परिसर’ अथवा ‘वरहाडघर गुफा’ कहा जाता है। नाम भले ही ‘कोटिलिंग’ हो, किंतु यहाँ एक करोड़ शिवलिंग नहीं, बल्कि सहस्रों शिवलिंग हैं। यहाँ का दुर्लभ सहस्रलिंगी शिवलिंग विशाल आकार का है। इसके ऊपर अनेक छोटे-छोटे शिवलिंग उत्कीर्ण हैं। इसके अतिरिक्त गुफाओं की तीनों दीवारों पर भी असंख्य शिवलिंगों की माला उत्कीर्ण की गई है। यहाँ उँगली के आकार के शिवलिंग से लेकर दोनों भुजाओं में समा न सकने वाले विशाल शिवलिंग तक, अनेक रूप देखने को मिलते हैं। इनमें सयोनी शिवलिंग तथा अयोनी शिवलिंग दोनों प्रकार उपलब्ध हैं। इनमें से कुछ शिवलिंग अलग से स्थापित हैं। कुछ सीधे पाषाण शिलाओं में ही उत्कीर्ण हैं। गुफा के द्वारपट्ट पर भी शिवलिंग का उत्कीर्णन किया गया है।
यहाँ की मुख्य विशेषता वह दुर्लभ ‘अग्निवृष’ पाषाण मूर्ति है। सम्मुख दृश्य में यह एक मानवीय मुख जैसा प्रतीत होता है। पार्श्व दृश्य से यह नंदी का रूप ले लेता है। इन दोनों आकृतियों के अंतर को दर्शाने के लिए दाढ़ी वाले भाग में दो रेखाकार खाँचे तराशे गए हैं। नंदी के शरीर और मनुष्य के धड़ वाले इस संयुक्त रूप के कारण यह पाषाण मूर्ति अत्यंत दुर्लभ और अद्वितीय है। इसके अतिरिक्त इन गुफाओं में एक मीटर ऊँचाई तथा साढ़े तीन मीटर परिधि वाला भव्य शिवलिंग भी स्थित है। विष्णु के दशावतारों को दर्शाने वाली पाषाण मूर्तियाँ यहाँ उपलब्ध हैं। नवग्रहों की पद्मासनस्थ पाषाण मूर्तियाँ दो शिल्प-पट्टों पर उत्कीर्ण हैं। विद्वानों के मतानुसार ये सभी पाषाण मूर्तियाँ तथा शिवलिंग १०वीं या ११वीं शताब्दी के माने जाते हैं।
इस पूरे परिसर में पार्वती, सरस्वती, महिषासुरमर्दिनी, सदाशिव, गणेश, हनुमान, नाग तथा सप्तमातृकाओं की पाषाण मूर्तियाँ हैं। इसी परिसर में चामुंडा देवी का भी मंदिर है। किंवदंती है कि इसी स्थान पर शिव-पार्वती का विवाह संपन्न हुआ था। अतः इस स्थान को उस विवाह के लिए आए हुए ‘बारात’ का ‘बारातघर’ माना जाता है। यहाँ उपस्थित सभी बाराती शिवलिंग रूप में विद्यमान हैं।
पाटेश्वर में महाशिवरात्रि तथा श्रावण सोमवार को हज़ारों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। ऐसा बताया जाता है कि इस मंदिर के जीर्णोद्धार हेतु अहिल्याबाई होलकर तथा सरदार अनगल ने आर्थिक सहायता प्रदान की थी। सहस्रों श्रद्धालुगणों के साथ-साथ प्रकृति प्रेमियों, पर्वतारोहियों, इतिहास-अन्वेषकों तथा मूर्तिशास्त्र के शोधकर्ताओं के लिए श्री क्षेत्र पाटेश्वर अत्यंत प्रमुख एवं विशिष्ट स्थान है।
प्रमुख विशेषताएँ
सतारा शहर से १४ किलोमीटर दूरी पर
सतारा से देगाँव तक एसटी बस सुविधा उपलब्ध
देगाँव से ४ किमी तक निजी वाहन द्वारा मार्ग
मंदिर परिसर में भक्तनिवास एवं भोजन की सुविधा उपलब्ध नहीं