आजजेथेचंद्रपूरमधीलशहरपोलिसठाणेआहे, त्याजागेवरपूर्वीनानासाहेबभोसलेयांचामहालहोता. इ. स. १८१७मध्येझालेल्यासीताबर्डीच्यालढाईनंतरइंग्रजांनीनागपूरवरताबामिळविला. त्यानंतरत्यांनीआजूबाजूच्याप्रदेशांमध्येहात–पायपसरायलासुरुवातकेली. इ. स. १८१८मध्येइंग्रजांनीनानासाहेबांचामहालजाळूनटाकला. यामहालाच्याशेजारीअसलेल्याकचेरीचेरूपांतरत्यांनीपोलीसठाण्यातकेले. कालौघातनानासाहेबांचावाडानष्टझालाअसलातरीत्यांनीबांधलेलेमुरलीधरमंदिर२००वर्षांनंतरहीत्याचजागेवरअढळअसूनत्यावरीलशेकडोवैशिष्ट्यपूर्णशिल्पेआजहीशाबूतआहेत.
चंद्रपुर में प्राचीन स्थापत्य वैभव और वास्तुशिल्प की प्रचुरता है। यहाँ प्रसिद्ध महाकाली मंदिर, अंचलेश्वर मंदिर और गोंड राजा बीरशाह का समाधि स्थल जैसी एक से बढ़कर एक विशेष स्थापत्य कला की धरोहरें देखने को मिलती हैं। इन सबमें शीर्ष स्थान पर नागपुर के भोसले शासकों द्वारा अपनी हवेली के समीप निर्मित श्री मुरलीधर मंदिर है। राजा व्यंकोजी उर्फ नानासाहेब भोसले के काल में निर्मित यह मुरलीधर मंदिर ‘विदर्भ का एलोरा’ कहलाने योग्य है। यह मंदिर उत्कीर्ण शिल्पों से सुसज्जित है।
चंद्रपुर शहर में नेताजी नगर भवन के पीछे गांधी चौक के पास मुरलीधर मंदिर स्थित है। अनेक इमारतों के बीच स्थित यह मंदिर ‘नानासाहेब का मंदिर’ नाम से भी प्रसिद्ध है। चंद्रपुर पूर्व में गोंड राज्य की राजधानी थी। बाद में नागपुर के भोसले शासकों ने चंद्रपुर पर विजय प्राप्त कर यहाँ अपना प्रभुत्व स्थापित किया। इसके पश्चात नानासाहेब भोसले ने अपने परिवार के लिए जहाँ महल बनवाया था, उसी महल के आँगन में यह मंदिर निर्मित किया गया। नागपुर शहर में स्थित भोसलेकालीन प्राचीन शिव मंदिर (भोंडा महादेव) और चंद्रपुर के इस मुरलीधर मंदिर के शिल्पों में बहुत समानता दिखाई देती है।
आज जहाँ चंद्रपुर शहर का पुलिस थाना है, उसी स्थान पर पूर्व में नानासाहेब भोसले का महल हुआ करता था। सन् 1817 में हुई सीताबर्डी की लड़ाई के बाद अंग्रेजों ने नागपुर पर अधिकार कर लिया। इसके बाद उन्होंने आसपास के प्रदेशों में भी अपना प्रभाव जमाना प्रारंभ किया। सन् 1818 में अंग्रेजों ने नानासाहेब का महल जला दिया। इस महल के पास स्थित कचहरी को उन्होंने पुलिस थाने में परिवर्तित कर दिया। समय के प्रवाह में नानासाहेब का महल नष्ट हो गया। किंतु उनके द्वारा निर्मित मुरलीधर मंदिर 200 वर्षों बाद भी उसी स्थान पर अडिग खड़ा है। इसके सौ से अधिक विशिष्ट शिल्प आज भी सुरक्षित हैं।
चंद्रपुर नगर निगम भवन के पास स्थित मुरलीधर मंदिर पूर्वाभिमुख है। यह आकार में बहुत बड़ा नहीं है। मंदिर तक जाने के लिए संकरा मार्ग है। मंदिर के चारों ओर लोहे की जाली का घेरा है। मुख्य द्वार के सामने विशाल चबूतरा है। इस चबूतरे की चारों ओर नक्काशी की गई है। चबूतरे के एक ओर छोटा हनुमान मंदिर है। प्रवेशद्वार के सामने नंदी विराजमान है। इस मंदिर के आगे सभामंडप नहीं है। इसका स्वरूप खुला चबूतरा, अंतराल और गर्भगृह जैसा है। अंतराल से गर्भगृह की ओर जाते समय द्वारशाखा पर अत्यंत सूक्ष्म नक्काशी दिखाई देती है। यह मंदिर यद्यपि मुरलीधर मंदिर नाम से प्रसिद्ध है, किंतु गर्भगृह में शिवलिंग है। शिवलिंग के पीछे श्रीगणेश, अन्नपूर्णा देवी और नाग-शिल्प उकेरे गए हैं। गर्भगृह के शिवलिंग से निकलने वाले जल के मार्ग पर बाहर की ओर वराहमुख का शिल्प है।
यह मंदिर शिल्पकला का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसकी बाहरी दीवारें पूरी तरह से उत्कीर्ण शिल्पों से आच्छादित हैं। मंदिर का निर्माण निचले भाग में काले पत्थर से किया गया है। इसका ऊपरी भाग यहाँ उपलब्ध लालिमायुक्त-पीले बलुआ पत्थर से निर्मित है। मंदिर पर उकेरे गए शिल्पों में रासलीला में लीन श्रीकृष्ण, बाँसुरी बजाते वेणुगोपाल, साक्षीगोपाल और कालियामर्दन शामिल हैं। इसके साथ ही वृक्ष पर छिपकर बैठे गोपाल, माखन चुराने वाले श्रीकृष्ण और वस्त्र माँगती गोपियाँ भी दर्शनीय हैं। यहाँ समुद्रमंथन, श्रीकृष्ण की विविध लीलाएँ, श्रीविष्णु, श्रीमहादेव और धनुर्धारी श्रीराम के शिल्प भी विद्यमान हैं। इनके अतिरिक्त नारद मुनि, सिंहारूढ़ दुर्गादेवी, गरुड़ारूढ़ श्रीनारायण और मृगरथ पर सवार चंद्र के चित्र उकेरे गए हैं। यहाँ मगरमच्छ, हाथी, विभिन्न पशु, व्याल, कमल पुष्प, बंदूकधारी द्वारपाल, साहूकार, नर्तकी, सुरसुंदरी और योद्धा जैसे अनेक शिल्प सम्मिलित हैं। हाथी पर सवारी करते सिंह की शिल्पाकृतियाँ भी यहाँ अनेक स्थानों पर दिखाई देती हैं। नीचे काले पत्थरों पर कीर्तिमुख की पट्टिका उकेरी गई है। मंदिर के शिखर का कुछ भाग ढह गया था, इसलिए पुरातत्व विभाग ने वहाँ टीन की छतरी बनाई है। चंद्रपुर का यह मंदिर वास्तव में पाषाण शिल्पकला का खजाना है। सरकार ने इसे संरक्षित स्मारक घोषित किया है।
प्रमुख विशेषताएँ
चंद्रपुर शहर के मध्यवर्ती भाग में स्थित मंदिर।
चंद्रपुर बस अड्डे से 2.5 किमी की दूरी पर।
जिला मुख्यालय होने के कारण संपूर्ण राज्य से राज्य परिवहन की सुविधा उपलब्ध है।
निजी वाहन सीधे मंदिर परिसर तक जा सकते हैं। परिसर में निवास और जलपान के अनेक विकल्प उपलब्ध हैं।