महाबलेश्वर जैसे शीतकालीन स्थल के कारण सातारा जिला महाराष्ट्र के नंदनवन के रूप में सुप्रसिद्ध है। श्रीमंत छत्रपति शाहू महाराज के समय से यह नगर मराठा साम्राज्य की राजधानी रहा। धार्मिक ग्रंथों में जिस नगर का उल्लेख ‘विराटनगरी’ के रूप में हुआ है, वही वर्तमान का वाई नगर एक प्रकृति-संपन्न शहर है। यहाँ कृष्णा नदी के किनारे स्थित गणपति घाट पर विराजमान महागणपति अर्थात ढोल्या गणपति का मंदिर वाई के निवासियों के ग्राम देवता तथा लाखों श्रद्धालुओं का आस्था का केंद्र है।
वाई नगर का यह महागणपति मंदिर पेशवाओं के सरदार गणपतराव भिकाजी रास्ते ने सन् 1762 में बनवाया। सरदार रास्ते पेशवा बालाजी बाजीराव के ससुर थे। इस मंदिर के निर्माण पर उस समय डेढ़ लाख रुपये खर्च हुए थे, ऐसा उल्लेख मिलता है। कृष्णा तट से सटा यह मंदिर अपनी विशिष्ट रचना के लिए प्रसिद्ध है। मंदिर का पिछला भाग नौकाकार है। ऐसा कहा जाता है कि इस आकार का उद्देश्य यह था कि जब कृष्णा नदी में बाढ़ आती है, तो नदी का पानी दोनों ओर विभाजित होकर बह जाए। इससे मंदिर पर दबाव कम पड़ता है और उसकी सुरक्षा हो सकती है।
महागणपति मंदिर की भव्य गणेशमूर्ति एक ही शिलाखंड से तराशी गई है। कहा जाता है कि इस मूर्ति के लिए प्रयुक्त विशेष काला पाषाण कर्नाटक से लाया गया था। इस विशाल मंदिर की रचना में सभामंडप और गर्भगृह दो भाग हैं। यहाँ का गर्भगृह 30 पद लंबा और 30 पद चौड़ा है। इसमें एक बड़े चबूतरे पर अखंड शिलाखंड से निर्मित छह पद ऊँची और सात पद चौड़ी गणेशमूर्ति विराजमान है। इसी विशाल मूर्ति के कारण इस गणपति को “ढोल्या गणपति” कहा जाता है।
महागणपति की प्रसन्न मुद्रा और उनके मुखमंडल का तेज विलक्षण है। यह मूर्ति बैठी हुई मुद्रा में है और इसके नेत्र अत्यंत तेजस्वी प्रतीत होते हैं। महागणपति की मूर्ति पर जनेऊ, गले में हार, बाजूबंद और पैरों में कड़ा धारण किए गए हैं। संकष्टी चतुर्थी, अंगारकी चतुर्थी और गणेश जयंती जैसे पर्वों पर इस मूर्ति को अनेक आभूषणों से अलंकृत किया जाता है। मूर्ति के पीछे अर्धचंद्राकार प्रभामंडल है। वाई नगर और आसपास के सभी मंदिरों में ढोल्या गणपति मंदिर का शिखर सबसे ऊँचा है। इसकी ऊँचाई तलहटी से 24 मीटर है। यहाँ के ग्रामवासी प्रत्येक कार्य का आरंभ इस महागणपति की आराधना से करते हैं। महागणपति जागृत देवता माने जाते हैं और भक्त की मनोकामना पूर्ण करते हैं। ऐसी ख्याति होने से प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु यहाँ दर्शन के लिए आते हैं। उत्सव के दिनों में यह संख्या 50,000 से 75,000 तक पहुँच जाती है। श्रद्धालुओं के साथ-साथ महाबलेश्वर और पंचगणी आने वाले पर्यटक भी यहाँ दर्शन हेतु अवश्य आते हैं। प्रतिदिन प्रातः 5:30 से रात्रि 9:30 बजे तक श्रद्धालु महागणपति के दर्शन कर सकते हैं। वैशाख शुद्ध त्रयोदशी को महागणपति स्थापना दिवस का वार्षिकोत्सव यहाँ उत्साहपूर्वक मनाया जाता है। त्रिपुरारी पूर्णिमा के दिन इस मंदिर तथा नदीघाट पर किया जाने वाला दीपोत्सव प्रसिद्ध है। उस समय पूरा परिसर हजारों टिमटिमाते दीपों से आलोकित हो उठता है।
महागणपति मंदिर के समीप कृष्णामाई मंदिर स्थित है। इस मंदिर परिसर तथा कृष्णा नदी के सात घाटों पर मनाया जाने वाला कृष्णामाई उत्सव अत्यंत प्रसिद्ध है। माघ शुद्ध प्रतिपदा से आरंभ होकर लगभग डेढ़ मास तक यह उत्सव चलता है। कहा जाता है कि नदी का ऐसा उत्सव मनाने वाला वाई संपूर्ण राज्य का एकमात्र स्थान है। कुछ विद्वानों के अनुसार स्वयं छत्रपति शिवाजी महाराज ने इस उत्सव का प्रारंभ किया था।
ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार, छत्रपति शिवाजी महाराज की हत्या के उद्देश्य से आया अफ़ज़ल ख़ान कई दिनों तक वाई में डेरा डाले रहा। उस समय आदिलशाही सेना द्वारा वहां भारी आतंक मचाया गया था, जिससे वाई के ग्रामवासी अत्यंत व्यथित थे। प्रतापगढ़ की तलहटी में होने वाली छत्रपति शिवाजी महाराज और अफ़ज़ल ख़ान की भेंट में महाराज को विजय प्राप्त हो, इस हेतु वाई के निवासियों ने नदी कृष्णामाता से मन्नत मांगी थी। जब महाराज ने अफ़ज़ल ख़ान का वध कर विजय प्राप्त की, तब कृतज्ञता स्वरूप वाई के हज़ारों ग्रामीणों ने कृष्णामाई की विशेष पूजा-अर्चना की। तभी से यह उत्सव एक अटूट परंपरा बन गया है। आज भी इस अवसर पर ढोल-ताशों की गूंज के बीच कृष्णामाई मंदिर से भव्य पालकी यात्रा निकलती है। संपूर्ण मार्ग को आकर्षक रंगोलियों और पुष्पों से सजाया जाता है। वाई के लगभग प्रत्येक घर से देवी को साड़ी-नारियल अर्पित कर आंचल भराई की जाती है। इस भव्य महोत्सव का साक्षी बनने के लिए प्रतिदिन हज़ारों श्रद्धालु और पर्यटक वाई आते हैं। साथ ही, शिक्षा या व्यवसाय के लिए बाहर रहने वाले स्थानीय निवासी भी इस समय विशेष रूप से देवी के दर्शन और उत्सव हेतु अपने पैतृक स्थान लौटते हैं।
प्रमुख विशेषताएं
सातारा शहर से 32 किमी दूरी पर
वाई बस स्टैंड से पैदल 10 मिनट (600 मीटर)
निजी वाहन महागणपति मंदिर के वाहनतल तक आ सकते हैं
परिसर में निवास एवं जलपान के लिए अनेक विकल्प उपलब्ध हैं