सतारा के निकट स्थित लिंब गाँव अपनी ‘बारा मोटा’ बावड़ी के लिए प्रसिद्ध है। कुएँ से बारह स्थानों से जल खींचने की सुविधा के कारण इसे यह नाम प्राप्त हुआ है। साथ ही, इस गाँव में कृष्णा नदी की धारा में पत्थर पर निर्मित कोटेश्वर महादेव का मंदिर श्रद्धालुओं का प्रमुख श्रद्धास्थान है। नदी के मध्य में स्थित होने के कारण यह मंदिर पर्यटकों को भी आकर्षित करता है। इस गाँव की एक विशेषता यह है कि छत्रपति शाहू महाराज ने संपूर्ण देश से विभिन्न प्रजातियों के आम मँगवाए थे। उन्होंने यहाँ एक आम के बगीचे का निर्माण कराया था। आज भी इस क्षेत्र में विभिन्न प्रजातियों के आम के वृक्ष दिखाई देते हैं।
इस मंदिर के विषय में एक पौराणिक कथा प्रचलित है। कृष्णा नदी का उद्गम महाबलेश्वर से होता है। वहाँ से लिंब गाँव तक कृष्णा तट पर एक करोड़ शिवलिंग स्थित हैं। अंतिम शिवलिंग लिंब गाँव में होने के कारण इस मंदिर को ‘कोटेश्वर’ नाम मिला। अतः इस मंदिर का महत्त्व श्री क्षेत्र महाबलेश्वर एवं पंचगंगा मंदिर के समान ही है। कृष्णा नदी का मधुर प्रवाह और चारों ओर का प्राकृतिक सौंदर्य अत्यंत मनोहर है। यहाँ की हरियाली और पक्षियों का मधुर कलरव मन को शांति प्रदान करता है। श्रद्धालुओं की दृढ़ मान्यता है कि ऐसे रमणीय वातावरण में स्थित यह प्राचीन मंदिर एक जागृत देवस्थान है।
पेशवा काल के सरदार नारो आप्पाजी खिरे (तुलसीबागवाले) लिंब गाँव के निवासी थे। उन्होंने पुणे का प्रसिद्ध तुलसीबाग और उसका श्रीराम मंदिर बनवाया था। इसी प्रकार उन्होंने लिंब में कोटेश्वर शिव मंदिर का निर्माण कराया। कृष्णा नदी पर बने पुल के समीप से नदी मार्ग होते हुए इस मंदिर तक पहुँचा जाता है। वर्षा ऋतु में जब नदी उफान पर होती है, तब मंदिर तक पहुँचना संभव नहीं होता। मंदिर परिसर में पत्थर बिछाए जाने से प्रांगण स्वच्छ और मनोहर दिखाई देता है।
मुख्य मंदिर से पहले बाईं ओर एक छोटे देवालय में श्री गणेश की मूर्ति है। आगे पत्रों से ढके हुए खुले सभामंडप में एक वट वृक्ष है। इसके चारों ओर वृत्ताकार चबूतरा निर्मित है। इस चबूतरे के नीचे विभिन्न देव-मूर्तियाँ स्थापित हैं। चबूतरे के पूर्व में नदी की ओर से मंदिर परिसर में आने हेतु प्राचीर का मुख्य प्रवेश द्वार है। इसके ऊपर नौबतखाना बना है। प्रवेश द्वार के सम्मुख दो कुंड हैं। इनमें से एक में नंदी और शिवलिंग स्थापित हैं। वहाँ से कुछ सीढ़ियाँ चढ़कर मंदिर परिसर में प्रवेश होता है।
चबूतरे के पश्चिम में कोटेश्वर महादेव का मुख्य मंदिर है। दर्शनमंडप में अखंड पाषाण से निर्मित नंदी की मूर्ति है। इस पर अलंकारों की सुंदर नक्काशी की गई है। गर्भगृह में काले पाषाण से निर्मित विशाल शिवलिंग है। मान्यता है कि मंदिर के सम्मुख स्थित कुंड में स्नान करके कोटेश्वर महादेव के दर्शन करने से त्वचा रोगों से मुक्ति मिलती है। भक्तगण यहाँ संपत्ति लाभ और नए वाहन के क्रय जैसी अपनी विशेष मन्नतें पूरी होने की प्रार्थना करते हैं।
महाशिवरात्रि और त्रिपुरारी पूर्णिमा के पर्व इस मंदिर में भव्य रूप से मनाए जाते हैं। प्रत्येक श्रावण सोमवार को यहाँ मेला लगता है। माघ शुक्ल प्रतिपदा से फाल्गुन पूर्णिमा तक वाई में ‘कृष्णामाई महोत्सव’ का आयोजन होता है। कहा जाता है कि स्वयं छत्रपति शिवाजी महाराज ने यह उत्सव प्रारंभ किया था। इसी अवधि में लिंब में भी कृष्णामाई उत्सव बड़ी भक्ति और भाव के साथ मनाया जाता है।
कोटेश्वर मंदिर के अतिरिक्त इस गाँव की ‘बारा मोटा’ बावड़ी ऐतिहासिक दृष्टि से प्रसिद्ध है। यह जल-प्रबंधन का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। सतारा-पुणे मार्ग पर लिंब से तीन किमी की दूरी पर यह बावड़ी स्थित है। इसका निर्माण छत्रपति शाहू महाराज की पत्नी रानी वीरूबाईसाहेब ने कराया था। इस बावड़ी में उतरने के लिए पत्थर की सीढ़ियाँ हैं। नीचे उतरते ही दुर्ग के समान प्रतीत होने वाली मेहराब दिखाई देती है।
बावड़ी के एक छोर से दूसरे छोर तक जाने के लिए भीतर पत्थर का एक पुल बना है। यहाँ के स्तंभों पर गणेश, हनुमान, हाथी, रानी वीरूबाईसाहेब, पुष्प और पक्षियों की मनोहर नक्काशी है।
भले ही यह बावड़ी ‘बारा मोटा’ नाम से प्रसिद्ध है, किंतु वास्तव में यहाँ पंद्रह ‘मोटा’ होने के संकेत मिलते हैं। इसकी संरचना से यह स्पष्ट होता है। यहाँ की जल वितरण प्रणाली विशिष्ट है। आसपास के खेतों को पानी पहुँचाने हेतु बनी 15 मोटों के अवशेष आज भी देखे जा सकते हैं।
बावड़ी के शिलालेख पर ‘श्रीमंत सौभाग्यवती वीरूबाईसाहेब’ अंकित है। शाहू महाराज द्वारा लिंब में लगाए गए आम के बगीचों को भी इसी बावड़ी का जल दिया जाता था। कहा जाता है कि शाहू महाराज यहाँ नियमित रूप से निवास करते थे।
मुख्य विशेषताएँ
सतारा नगर से 9 किमी तथा महाबलेश्वर से 25 किमी की दूरी।
सतारा नगर से राज्य परिवहन (एस.टी.) बस सुविधा उपलब्ध।
निजी वाहन सीधे मंदिर वाहनतल तक पहुँच सकते हैं।
परिसर में भक्तनिवास और जलपान की सुविधा उपलब्ध नहीं है।