सतारा जिले के वाई नगर को धार्मिक, ऐतिहासिक तथा भौगोलिक दृष्टि से विशेष महत्त्व प्राप्त है। कृष्णा नदी के तट पर स्थित यह नगर प्राचीन काल से ही वेदविद्या और संस्कृत अध्ययन के प्रमुख केंद्र के रूप में प्रसिद्ध रहा है। वाई नगर का प्रमुख श्रद्धा-स्थल ‘महागणपति मंदिर’ है। इसके समीप स्थित ‘काशी विश्वेश्वर मंदिर’ अपने शिल्प-सौंदर्य एवं सैकड़ों विशिष्ट मूर्तियों के कारण ‘शिल्पमंदिर’ के रूप में विख्यात है। पेशवा काल में निर्मित इस मंदिर की शिल्प-रचना का अवलोकन करने पर मराठा कालीन वास्तुकला की दिव्यता और समृद्धि का साक्षात्कार होता है।
19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में वाई नगर में छोटे-बड़े मिलाकर 100 से अधिक मंदिर विद्यमान थे। इनमें से अधिकांश मंदिर छत्रपति शाहू महाराज (1707–1749) तथा उनके बाद के पेशवा काल में रास्ते घराने के कार्यकाल में निर्मित हुए। इन सभी मराठा कालीन मंदिरों में उत्कृष्ट वास्तुकला का सर्वोत्तम उदाहरण काशी विश्वेश्वर मंदिर है। लगभग चार पद ऊँचे चबूतरे पर पूर्वाभिमुख स्थित यह मंदिर पेशवा कालीन सरदार गणपतराव भिकाजी रास्ते द्वारा सन् 1757 में निर्मित कराया गया था। इस निर्माण में लगभग डेढ़ लाख रुपए व्यय हुए थे। उन्होंने अपने पुत्र काशीनाथ की स्मृति में इस मंदिर का नाम काशी विश्वेश्वर रखा।
मंदिर के चारों ओर पंद्रह पद ऊँची और लगभग चार पद चौड़ी पाषाण से बनी प्राचीर (तटबंदी) है। इस प्राचीर पर चढ़कर मंदिर के शिखर पर स्थित शिल्पों का अवलोकन किया जा सकता है। मंदिर की रचना नंदीमंडप, सभामंडप, अंतराल (कक्ष) और गर्भगृह, इन चार भागों में विभक्त है। नंदीमंडप के पीछे, सोलह नक्काशीदार पाषाण स्तंभों पर टिका हुआ एक विशाल खुला मंडप स्थित है। यह चारों दिशाओं से खुला एक सभामंडप है। इस खुले मंडप के पूर्वी भाग की तटबंदी में भव्य महाद्वार है। इसके ऊपर नौबतखाना स्थित है। मंडप के दोनों ओर ऊँची दीपमालाएँ हैं। इन दीपमालाओं की विशेषता यह है कि इनके शीर्ष पर कमलाकृति शिल्प है। इनमें दीप प्रज्वलित करने की व्यवस्था की गई है।
मंदिर के सम्मुख तीन पद ऊँचे चबूतरे पर नंदीमंडप स्थित है। इसमें काले वालुकाश्म (पाषाण) से निर्मित नंदी की मूर्ति स्थापित है। यह मूर्ति चार पद लंबी तथा तीन पद ऊँची, चमकदार और अत्यंत सुगठित है। नंदी के कंठ में माला, श्रृंखला और पीठ पर अलंकरणयुक्त झूल का सूक्ष्म अंकन किया गया है। यहाँ घंटियों का भी सुंदर चित्रण है। सभामंडप में विशेष नक्काशी नहीं है। अंतराल की बाईं और दाईं ओर के देवकोष्टकों में गणपति और मारुति की मूर्तियाँ हैं। सभामंडप की छत गुंबदाकार है। इसके मध्य भाग में कमल का मनोहर उत्कीर्णन है। अंतराल से गर्भगृह के प्रवेश द्वार की द्वारशाखाओं पर सूक्ष्म नक्काशी है। इसमें कुंभ, फूल तथा वानर आकृतियों का अंकन है। प्रवेश द्वार के दोनों ओर द्वारपालों की मूर्तियाँ हैं। द्वार के निचले भाग में दो कीर्तिमुख तथा ललाटबिंब पर गणेश की मूर्ति है। गर्भगृह के मध्य भाग में अखंड काले पाषाण से निर्मित विशाल शिवलिंग स्थापित है। उसके समक्ष पार्वती जी की मूर्ति है। गर्भगृह की छत ‘खुली छतरी’ के समान (छत्राकृति) प्रतीत होती है। प्रकाश के प्रवेश हेतु उत्तर एवं दक्षिण दिशा में जालीदार गवाक्ष (झरोखे) बने हैं।
काशी विश्वेश्वर मंदिर का शिखर अत्यंत विशिष्ट है। यह मराठा कालीन वास्तुशैली की पहचान प्रस्तुत करता है। इसे ईंट और चूने से निर्मित किया गया है। शिखर में लगभग 110 देवकोष्टक हैं। इन शिल्पों में विभिन्न मूर्तियाँ आज भी सुस्थित हैं। सबसे ऊपर की श्रेणी में दशावतार मूर्तियाँ हैं। उनके नीचे ऋषियों तथा सरदारों की आकृतियाँ उत्कीर्ण हैं। अन्य मूर्तियों में देवी-देवता, नृत्यांगनाएँ तथा मैथुन-शिल्प अंकित हैं।
नंदीमंडप के सम्मुख प्रवेश द्वार के शिखर के देवकोष्टकों में महिषासुरमर्दिनी, गणपति और सरस्वती की मूर्तियाँ हैं। शिखर के दक्षिणी भाग में नीचे की ओर दो वीणावादिनी युवतियों की मूर्तियाँ हैं।
अन्य शिल्पों में राधा-कृष्ण, श्रीराम-सीता और उड़ान मुद्रा में हनुमान के दर्शन होते हैं। यहाँ राजसी आसन में विराजमान सरदार, माता-बालक की मूर्तियाँ, नृत्यांगनाएँ, प्रणय दृश्य तथा विभिन्न पगड़ियों वाले सरदारों के रूपांकन भी हैं।
महागणपति के दर्शन हेतु आने वाले श्रद्धालु, पर्यटक और शिल्प-अध्येता यहाँ के शिल्प-वैभव का दर्शन करने अवश्य आते हैं।
मंदिर के पीछे स्थित कुएँ से फरवरी 2022 में गाद निकालते समय शस्त्रों का एक संग्रह प्राप्त हुआ था। इसमें 17वीं शताब्दी के कटार और खंजर जैसे शस्त्र थे। वर्तमान में यह शस्त्र-संग्रह पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है।
प्रमुख विशेषताएँ
सतारा शहर से ३२ किलोमीटर की दूरी।
वाई बस अड्डा से पैदल मात्र १० मिनट।
संपूर्ण राज्य से अनेक जिलों से वाई हेतु राज्य परिवहन की सुविधा उपलब्ध है।
निजी वाहन महागणपति मंदिर पार्किंग तक आ सकते हैं।
मंदिर परिसर के निकट भोजन एवं भक्तनिवास हेतु पर्याप्त विकल्प उपलब्ध हैं।