कृष्णा नदी पर बाँध बनाए जाने के कारण वाई तहसील का ‘धोम’ गाँव अत्यंत प्रसिद्ध है। किंतु इससे भी अधिक प्राचीन समय से इस गाँव की पहचान यहाँ स्थित विशिष्ट ‘श्रीलक्ष्मी-नृसिंह मंदिर’ के कारण है। इस मंदिर के सम्मुख १६ पंखुड़ियों वाला, काले पाषाण से निर्मित कमल का जो शिल्प है, वह अत्यंत दुर्लभ माना जाता है। इस कमलाकृति कुंड में एक विशाल पाषाण-कछुए की पीठ पर अष्टकोणीय नंदीमंडप बनाया गया है। इसमें विशिष्ट नक्काशी वाली नंदी की मूर्ति स्थापित है। इस कुंड के एक ओर लक्ष्मी-नृसिंह मंदिर और ठीक सम्मुख सिद्धेश्वर महादेव मंदिर स्थित है।
पूर्वकाल में ‘विराटनगरी’ नाम से प्रसिद्ध वाई नगर मंदिरों के शहर के रूप में जाना जाता है। इतिहास और स्थापत्यकला का मनोहर संगम प्रस्तुत करने वाला यह नृसिंह मंदिर वाई के निकटवर्ती वालकी और कृष्णा नदियों के संगम स्थल ‘धोम’ गाँव में स्थित है। इस मंदिर का प्रवेश द्वार किसी दुर्ग के समान प्रतीत होता है। प्रवेश द्वार के दोनों ओर भव्य पाषाण-बुर्ज हैं। यहाँ का विशाल लकड़ी का द्वार इसकी प्राचीनता का प्रमाण देता है। इस प्रवेश द्वार से संकरी पगडंडी द्वारा आगे बढ़ने पर श्रीलक्ष्मी-नृसिंह मंदिर तक पहुँचा जाता है। यह अनोखा मंदिर ऊँचा और वृत्ताकार निर्मित है। इसके मध्य भाग में श्रीलक्ष्मी-नृसिंह का गर्भगृह है। उसके चारों ओर वृत्ताकार दीर्घा बनाकर प्रदक्षिणा मार्ग निर्मित किया गया है।
श्रीलक्ष्मी-नृसिंह का यह स्थान एक बड़े लकड़ी के स्तंभ पर स्थित है। यहाँ पहुँचने हेतु संकरी सीढ़ियाँ बनाई गई हैं। संपूर्ण निर्माण में सागवान की लकड़ी का उपयोग हुआ है। पूर्व-पश्चिम दिशा में स्थित इस मंदिर में एक ओर हिरण्यकशिपु राक्षस का वध करते हुए नृसिंह की उग्र स्वरूप वाली मूर्ति स्थापित है। दूसरी ओर सिंहासनारूढ़ चतुर्भुज सौम्य स्वरूप की मूर्ति स्थापित है। इसमें नृसिंह की गोद में लक्ष्मी जी विराजित हैं। इस मंदिर के सम्मुख स्थित एक अन्य मंदिर में भक्त प्रह्लाद की मूर्ति है। ऐसा कहा जाता है कि ज्येष्ठ माधवराव पेशवा के स्वास्थ्य लाभ के लिए नारायणराव पेशवा ने दिसंबर १७६९ में यहाँ ब्राह्मणों द्वारा अनुष्ठान संपन्न करवाया था। वैशाख शुक्ल दशमी के दिन यहाँ नृसिंह जयंती बड़े उत्साह से मनाई जाती है।
लक्ष्मी-नृसिंह मंदिर परिसर में ही सिद्धेश्वर महादेव का प्राचीन पाषाण-मंदिर स्थित है। इस मंदिर के सम्मुख ही अद्वितीय स्थापत्य वाला कुंड और उसके ऊपर अष्टकोणीय नंदीमंडप है। मनोहर काले पाषाण में कमल के पुष्प के आकार का कुंड निर्मित किया गया है। उसके मध्य में दो मीटर लंबा पाषाण-कछुआ बैठाया गया है। इस कछुए की पीठ पर अष्टकोणीय मंडप है और उसमें नंदी विराजमान हैं। जब कुंड में जल भर जाता है, तब ऐसा प्रतीत होता है मानो कछुआ अपनी पीठ पर मेघडंबरी सदृश मंदिर लेकर जल में तैर रहा हो। यह मंदिर और इसकी कलाकृति दर्शनीय है।
इस कुंड के सम्मुख सिद्धेश्वर मंदिर है। कहा जाता है कि यह मंदिर धौम्य ऋषि द्वारा स्थापित किया गया था। उन्हीं के नाम पर इस गाँव को ‘धोम’ नाम प्राप्त हुआ। इस मंदिर तथा इसके स्तंभों पर की गई नक्काशी अत्यंत विशिष्ट है। अखंड काले पाषाण में इतनी सूक्ष्म नक्काशी कला अन्यत्र दुर्लभ है। मंदिर के गर्भगृह में भी मनोहर नक्काशी की गई है। गर्भगृह में अखंड पाषाण से निर्मित छह परतों वाला शिवलिंग स्थापित है। मंदिर के भीतरी भाग की छत पर कमल के समान पुष्पाकार नक्काशी उकेरी गई है।
सिद्धेश्वर मंदिर ‘शिव-पंचायतन’ स्वरूप में है। मंदिर के चारों दिशाओं में क्रमशः श्रीविष्णु, श्रीगणेश, देवी पार्वती और सूर्यदेव के छोटे मंदिर हैं। पार्वती मंदिर में श्रीगणेश और कार्तिकेय सहित पार्वती जी की संयुक्त मूर्ति है। सूर्यदेव मंदिर में सात घोड़ों के रथ पर आरूढ़ सूर्यदेव की मूर्ति प्रतिष्ठित है। महादेव मंदिर के आधार भाग में धौम्य ऋषि की समाधि है। वहाँ तक पहुँचने के लिए नीचे विवर में उतरना पड़ता है।
मंदिर के उत्तरी द्वार के सम्मुख एक छोटा गणेश मंदिर है। इसके सम्मुख ‘पंचमुखी शिवस्तंभ’ है। इसमें चार मुख चारों दिशाओं में और पाँचवाँ मुख आकाश की ओर है। इस स्तंभ पर की गई नक्काशी भी अद्वितीय है। इस स्तंभ को संपूर्ण मंदिर का ऊर्जा-स्थान माना जाता है। मंदिर परिसर में एक कुआँ है, जिसे ‘अंधकार कूप’ कहा जाता है। यह बंद कुआँ है और इसका जल कभी नहीं सूखता। इसमें उतरने के लिए पत्थरों की सीढ़ियाँ बनी हैं। प्राचीन काल से ही इस कुएँ के जल का उपयोग मंदिर के कार्यों में किया जाता है। वैशाख पूर्णिमा को सिद्धेश्वर मंदिर का मेला आयोजित किया जाता है।
यहाँ के ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, पुणे के साहूकार शिवराम ने पेशवा काल के दौरान सन् १७८० में इन मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया था। संभाजी महाराज, शाहू महाराज आदि कई शासकों ने समय-समय पर इन मंदिरों को सनद (राजकीय दानपत्र) प्रदान की हैं।
मुख्य विशेषताएँ
वाई से दूरी १० किमी तथा सतारा से ४२ किमी है।
वाई से राज्य परिवहन की सुविधा उपलब्ध है।
निजी वाहन से मंदिर के पार्किंग स्थल तक पहुँचा जा सकता है।
मंदिर परिसर में भक्तनिवास व भोजन की व्यवस्था उपलब्ध नहीं है।