सतारा जिले में महाबलेश्वर के निकट स्थित पंचगनी नगर की अपनी विशिष्ट पहचान है। सुखद वातावरण, पहाड़, घाटियाँ, झरने, गुफाएँ और पठार—ऐसा प्राकृतिक सौंदर्य पंचगनी की विशेषता है। पर्यटन की दृष्टि से प्रसिद्ध पंचगनी को ऐतिहासिक तथा धार्मिक महत्त्व भी प्राप्त है। पंचगनी शहर के समीप स्थित दांडेघर गाँव का प्राचीन केदारेश्वर मंदिर और शहर में स्थित जागृत ‘घाटजाई देवी’ मंदिर—ये दोनों मंदिर हज़ारों श्रद्धालुओं के आस्था-केंद्र हैं। इनमें केदारेश्वर मंदिर अपनी प्राचीन वैभवपूर्ण परंपरा के लिए प्रसिद्ध है। वहीं घाटजाई देवी मंदिर यहाँ आयोजित उत्सवों के लिए जाना जाता है।
वाई–महाबलेश्वर मार्ग पर पसरणी घाट पार करने के बाद पंचगनी से दो किलोमीटर पहले दांडेघर गाँव आता है। मुख्य मार्ग से लगभग 200 मीटर अंदर गाँव के मध्य में प्राचीन केदारेश्वर मंदिर स्थित है। यह मंदिर हेमाडपंती शैली में निर्मित है। इसका निर्माण 12वीं या 13वीं शताब्दी का माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि छत्रपति शिवाजी महाराज अनेक बार यहाँ दर्शनार्थ पधारे थे। मंदिर के चारों ओर पत्थर की ऊँची प्राचीर है। इस प्राचीर में बनी पत्थर की मेहराबों से नीचे उतरती हुई सीढ़ियों द्वारा मंदिर तक पहुँचना पड़ता है। इन सीढ़ियों के दोनों ओर श्रद्धालुओं के ठहरने हेतु बैठक स्थान बने हुए हैं।
मंदिर की मेहराब के पास पूजा-सामग्री की दुकानें हैं। मेहराब से भीतर प्रवेश करते ही नीचे की ओर स्थित प्राचीन मंदिर के दर्शन होते हैं। मंदिर की संरचना—नंदीमंडप, नंदीमंडप और सभामंडप को जोड़ने वाला मंडप (संलग्न मंडप), सभामंडप और गर्भगृह—इस प्रकार है। नंदीमंडप में नंदी की ढाई से तीन पद ऊँची मूर्ति है। इसे पीतल का मुखौटा पहनाया गया है। इससे इसका रूप अत्यंत विशिष्ट प्रतीत होता है। नंदी को इस प्रकार पीतल का मुखौटा पहनाने की प्रथा हर जगह विरल ही मिलती है। नंदीमंडप से दो पद की दूरी पर मुख्य मंदिर का जोड़-मंडप है। मुख्य सभामंडप से जुड़े इस जोड़-मंडप में पत्थर के 10 स्तंभ हैं। वहीं सभामंडप में 16 स्तंभ हैं। ये सभी वृत्ताकार संरचना के हैं। सभामंडप से गर्भगृह की ओर जाने के लिए एक छोटा प्रवेश द्वार है। इसकी दोनों ओर श्री भैरवनाथ और देवी काडेश्वरी सहित अनेक प्राचीन देवी-देवताओं की मूर्तियाँ स्थापित हैं। सभामंडप से कुछ नीचे उतरकर गर्भगृह तक पहुँच सकते हैं। वहाँ एक विशाल प्राचीन शिवलिंग है। जलाधारी के स्थान पर कुछ पत्थर हैं। इनसे निरंतर जल प्रवाहित होता रहता है। यही जल मंदिर के पीछे स्थित पुष्करिणी (कुंड) में पहुँचता है। इस मंदिर की विशेषता यह है कि मुख्य शिवलिंग सहित कुल 22 प्राचीन पाषाण मूर्तियाँ यहाँ विद्यमान हैं। इनकी कलाकारी और नक्काशी आज भी सुरक्षित दिखाई देती है।
मंदिर के प्रांगण में हर जगह पत्थर का फर्श है। मंदिर निर्माण के समय बिछाए गए ये पत्थर आज भी यथावत सुरक्षित हैं। मंदिर की दाईं ओर प्रदक्षिणा मार्ग पर श्री सती और श्री जननी माता की मूर्तियाँ हैं। मंदिर के पीछे एक छोटी पुष्करिणी है। इसमें निरंतर गोमुख से जल प्रवाहित होता है। इस पुष्करिणी में नीचे उतरने हेतु तीन दिशाओं में सीढ़ियाँ बनी हैं। मंदिर के सम्मुख नंदीमंडप के पीछे श्री गणेश, श्री दाजी बुवा और संत दत्तात्रेय महाराज कलंबे की मूर्तियाँ स्थापित हैं। मंदिर के समीप एक आम का वृक्ष है। इस पर अश्विन मास में नई कोंपलें आती हैं। इस प्रकार का असमय फल-फूल देने वाला वृक्ष अत्यंत दुर्लभ माना जाता है।
केदारेश्वर मंदिर से लगभग दो किलोमीटर की दूरी पर वाई–पंचगनी मार्ग के निकट मेहराब स्थित है। यह पंचगनी शहर की आराध्य देवी के रूप में प्रसिद्ध श्री घाटजाई कालेश्वरी देवी मंदिर की मेहराब है। वहाँ से कुछ दूरी आगे घने वनक्षेत्र में टेबल लैंड (पठार) के ऊपर घाटजाई कालेश्वरी देवी का मंदिर है। यह एक जागृत देवस्थान है। श्रद्धालुओं में यह मान्यता प्रचलित है कि देवी की कृपा से घाट-मार्ग पर दुर्घटनाएँ नहीं होतीं। वहाँ कोई बड़ी हानि नहीं होती है।
प्रकृति-संपन्न परिसर में स्थित यह देवी मनोकामना पूर्ण करने वाली मानी जाती हैं। पास ही स्थित पसरणी के भैरवनाथ का मेला संपन्न होने के बाद माघ कृष्ण (वद्य) नवमी और दशमी को ‘घाटजाई कालेश्वरी’ का वार्षिक मेला प्रारंभ होता है। इस समय झाँझों की थाप पर ढोल-वादक दलों के बीच होने वाली स्पर्धा मुख्य आकर्षण होती है। गुलाल एवं नारियल उड़ाना इस उत्सव की विशेष पहचान है। मंदिर परिसर को पताकाओं और रोशनी से सजाया जाता है।
मेले के दौरान देवी का भंडारा और देवी की पालकी की शोभायात्रा (छबीना) आयोजित की जाती है। इसमें जागरण, ढोल पथक व लेझीम दलों की जुगलबंदी और लोकनाट्य जैसे विविध कार्यक्रम होते हैं। इसके अतिरिक्त रामदास नवमी (फाल्गुन कृष्ण नवमी) को भी देवी का जागरण और मेला संपन्न होता है। इस समय भी हज़ारों श्रद्धालु दर्शनार्थ आते हैं। इसके अलावा प्रत्येक मंगलवार, शुक्रवार तथा नवरात्रि के नौ दिनों में यहाँ श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है।
विशेष जानकारी
पंचगनी बस अड्डे से केदारेश्वर मंदिर 2 किमी दूरी पर है।
संपूर्ण राज्य से पंचगनी हेतु एस.टी. सुविधा उपलब्ध है।
निजी वाहन केदारेश्वर एवं घाटजाई मंदिर तक जा सकते हैं।
आसपास भक्तनिवास एवं भोजन के अनेक विकल्प उपलब्ध हैं।