नागपुर शहर के सीताबर्डी क्षेत्र में स्थित टेकड़ी गणेश का यह देवस्थान विदर्भ के अष्टविनायकों में से एक माना जाता है। मुद्गल पुराण में इस स्थान का उल्लेख मिलता है। मंदिर के मध्य भाग में पीपल के वृक्ष के नीचे स्थित यह मूर्ति सैकड़ों वर्ष पुरानी बताई जाती है। यह मंदिर नागपुर के सबसे समृद्ध देवस्थानों में गिना जाता है। चूँकि यह मंदिर नागपुर शहर की पहाड़ी पर स्थित है, इसलिए इस गणेश का नाम “टेकड़ी गणेश” प्रचलित हुआ।
कहा जाता है कि 1866 में जब यहाँ की पहाड़ी को काटकर रेलवे लाइन बिछाने का काम चल रहा था, उस समय खुदाई करते हुए मजदूरों को सिंदूर चढ़ी हुई गणेश मूर्ति प्राप्त हुई। जैसे ही यह मूर्ति दिखाई दी आसमान घिर गया और बिजली कड़कने लगी। मजदूरों ने मूर्ति को वहीं पास के पीपल वृक्ष के नीचे स्थापित किया। तभी से इस मूर्ति की पूजा-अर्चना प्रारंभ हुई।
1865 के नागपुर के नक्शे में इस मंदिर का उल्लेख नहीं मिलता। इससे अनुमान लगाया जाता है कि इससे पहले यहाँ स्थित प्राचीन गणेश मंदिर नष्ट या ध्वस्त हो चुका था। पहले यहाँ मंदिर होने का उल्लेख अन्य जगहों पर मिलता है।
यादव काल में रामटेक में राम मंदिर निर्माण के साथ हेमाद्री पंडितों ने टेकड़ी गणेश मंदिर का भी निर्माण कराया ऐसा वर्णन मिलता है। कहा जाता है कि यादव वंश की ओर से इस गणेश की पूजा होती थी। परंतु यह मूर्ति यादव काल की है या नहीं, इस पर शोधकर्ताओं में मतभेद है।
मराठा साम्राज्य के सरदार रघुजी भोसले की मृत्यु के बाद 1896 में अंग्रेज नागपुर में आए। वर्तमान में जहाँ मंदिर स्थित है, उस सीताबर्डी पहाड़ी के नीचे ही अंग्रेजों की रेजीडेंसी थी। तब से यह क्षेत्र अंग्रेजों के अधीन था। स्वतंत्रता के बाद यह परिसर भारतीय सेना के नियंत्रण में है। अंग्रेजों के समय सीताबर्डी किले में स्थानीय नागरिकों को प्रवेश की अनुमति नहीं थी। सैनिक छावनी नजदीक होने के कारण अंग्रेजों ने गणेश मूर्ति पर केवल एक टीन की झोपड़ी बनाने की अनुमति दी।
उसी अनुसार 1936 में गणेश मूर्ति के चारों ओर झोपड़ी बनाई गई। 1965 तक मंदिर इसी रूप में रहा। उसके बाद धीरे-धीरे जीर्णोद्धार और नवीनीकरण हुआ। 2020 में हुए नवीनीकरण के बाद मंदिर को वर्तमान स्वरूप मिला। यह मंदिर हल्के गुलाबी पाषाणों से राजस्थान के कारीगरों द्वारा निर्मित है। इसकी नक्काशी व संरचना विशिष्ट प्रतीत होती है। 20,000 वर्ग फुट क्षेत्र में यह मंदिर फैला हुआ है। मंदिर का प्रवेशद्वार रेलवे लाइन की ओर पूर्व दिशा में है। सभामंडप के मध्य स्थित पीपल वृक्ष के नीचे दाहिनी सूंड़ वाले गणेश की मूर्ति है। इस मूर्ति का मुकुट और आँखें चाँदी की हैं। प्रत्येक मंगलवार को इस मूर्ति पर सिंदूर चढ़ाया जाता है।
मूर्ति के पीछे बाईं ओर 5 फुट ऊँची कालभैरव की मूर्ति और दाईं ओर नंदी पर आरूढ़ शिवलिंग स्थित है। यहाँ पीपल वृक्ष के समीप राधा-कृष्ण मंदिर भी है। इसके अलावा राम-सीता-लक्ष्मण, दक्षिणमुखी हनुमान तथा महालक्ष्मी की मूर्तियाँ भी यहाँ स्थापित हैं।
प्रत्येक मंगलवार और संकष्टी चतुर्थी को हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। अंगारकी चतुर्थी, गणेश जयंती, गणेश चतुर्थी से अनंत चतुर्दशी के बीच यहाँ मेले जैसा वातावरण रहता है। इसके अलावा कालभैरव जयंती, हनुमान जयंती, कोजागरी पूर्णिमा को भी उत्सव मनाए जाते हैं।
यह भव्य और जागृत देवस्थान है। यहाँ के गणपति मनोकामना पूर्ण करते हैं, ऐसी श्रद्धालुओं की आस्था है। इसलिए हजारों श्रद्धालु प्रतिदिन दर्शन हेतु आते हैं। माघ शुक्ल चतुर्थी के दिन यहाँ विशाल मेला आयोजित किया जाता है।
ऐसा कहा जाता है कि इस मंदिर में पूर्व प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिंह राव, अटल बिहारी वाजपेयी, पूर्व मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख, गायिका आशा भोसले, अनुप जलोटा, जितेंद्र अभिषेकी, सुनील दत्त आदि दर्शन के लिए आए हैं। नागपुर में जब क्रिकेट मैच होते थे तब सचिन तेंदुलकर भी विशेष रूप से दर्शन हेतु यहाँ आते थे। प्रतिदिन 4 बार गणेश की आरती होती है। संकष्टी चतुर्थी और एकादशी के दिन इस गणेश मूर्ति को विशेष श्रृंगार से सजाया जाता है। प्रतिदिन सुबह 6 बजे से रात 12 बजे तक श्रद्धालु मंदिर में दर्शन कर सकते हैं।
मुख्य विशेषताएँ :
नागपुर रेलवे स्टेशन से पैदल केवल 10 मिनट की दूरी।
नागपुर के लिए राज्य के विभिन्न भागों से राज्य परिवहन की बसें, रेल और विमान सेवा उपलब्ध।