काटोल शहर का धार्मिक, पौराणिक तथा ऐतिहासिक महत्त्व है। प्राचीन काल में काटोल कुंतलापुर नाम से प्रसिद्ध था। काटोल स्थित चंडिका माता मंदिर पांडवकालीन है। इसका निर्माण राजा चंद्रहास ने किया था, ऐसा उल्लेख पुराणों में मिलता है। यह मंदिर विदर्भ के अनेक श्रद्धालुओं के लिए भक्ति और शक्ति का प्रमुख स्थान है। चंडिका देवी मंदिर में मनाया जाने वाला नवरात्रोत्सव प्रसिद्ध है। यहाँ का श्रृंगारमंडप विशेष होता है। इस श्रृंगारमंडप को देखने और देवी के दर्शन के लिए यहाँ हज़ारों श्रद्धालु आते हैं।
प्राचीन ग्रंथों के उल्लेखों के अनुसार, पूर्वकाल में शक्तिशाली राजा अपने सामर्थ्य को सिद्ध करने के लिए अश्वमेध यज्ञ करते थे। यज्ञ का घोड़ा अन्य राज्यों में विचरण करता था। जिस राज्य से यह घोड़ा गुज़रता, वह राज्य यज्ञ करने वाले राजा के अधीन हो जाता। यदि कोई इस घोड़े को रोकता, तो उसे युद्ध करना पड़ता। इसी प्रकार कौरवों पर विजय प्राप्त करने के बाद संपूर्ण भारत पर अपना अधिकार स्थापित करने के लिए पांडवों ने अश्वमेध यज्ञ करने का निश्चय किया। उसी के अनुसार पांडवों का अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा अनेक राज्यों को पार करता हुआ कुंतलापुर नगरी में पहुँचा। उस समय कुंतलापुर में राजा चंद्रहास राज्य कर रहे थे। उनकी आज्ञा से सैनिकों ने घोड़े को रोक दिया। तभी उस घोड़े की रक्षा करने वाली पांडव सेना कुंतलापुर नगर के निकट पहुँची। इस सेना का नेतृत्व अर्जुन कर रहे थे और उनके साथ स्वयं श्रीकृष्ण थे।
अर्जुन ने अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा रोकने वाले राजा चंद्रहास को युद्ध का निमंत्रण दिया। किंतु राजा ने घोड़ा युद्ध के लिए नहीं, बल्कि श्रीकृष्ण के दर्शन के लिए रोका था। उन्होंने सम्मानपूर्वक श्रीकृष्ण और अर्जुन को अपने दरबार में आमंत्रित कर उनका आदर-सत्कार किया। श्रीकृष्ण के दर्शन के पश्चात उन्होंने अश्वमेध यज्ञ की सेना में सम्मिलित होने की इच्छा व्यक्त की। श्रीकृष्ण की अनुमति मिलने पर राजा चंद्रहास ने अपना राज्य अपने पुत्र मकरध्वज को सौंपकर अर्जुन और श्रीकृष्ण के साथ प्रस्थान किया। उससे पहले उन्होंने अपनी आराध्य देवी चंडिका माता के दर्शन किए। महाभारत में वर्णित कुंतलापुर वास्तव में कहाँ था, इस पर विद्वानों में मतभेद है। किंतु अनेक विद्वान मानते हैं कि राजा चंद्रहास का कुंतलापुर आज का काटोल शहर है। उनके द्वारा निर्मित चंडिका मंदिर ही आज काटोल शहर के मध्य भाग में स्थित चंडिका माता मंदिर है।
काटोल शहर के मध्य भाग में स्थित चंडिका मंदिर, काटोल निवासियों का श्रद्धास्थान है। लगभग ८०० से ८५० वर्ष पूर्व निर्मित यह मंदिर यादवकालीन बताया जाता है। समय-समय पर मंदिर की मरम्मत हुई है, फिर भी प्राचीनता के चिह्न मंदिर में हर जगह दृष्टिगोचर होते हैं। मुख्य शिखर का ऊपरी भाग और मंदिर की कुछ दीवारें बाद में बनवाई गईं। मंदिर की रचना मुखमंडप, सभामंडप, अंतराल और गर्भगृह के रूप में है।
मंदिर ऊँचे चबूतरे पर स्थित है। इसकी बाहरी दीवारों पर अनेक शिल्प अंकित हैं। इनमें गजमालिका (एक पंक्ति में हाथियों की विविध शिल्पाकृतियाँ) और मैथुन शिल्प भी शामिल हैं। ७ से ८ सीढ़ियाँ चढ़कर मंदिर के मुखमंडप में प्रवेश होता है। सीढ़ियों के दोनों ओर छोटी दीपमालाएँ हैं। सभामंडप के मध्य भाग में ४ पत्थर के स्तंभ हैं, जिन पर विशेष नक्काशी की गई है। इन स्तंभों के बीच हवनकुंड है। स्तंभों के ऊपर वृत्ताकार छत की संरचना है। छत के शिखर पर छोटी खिड़की है। यह रचना इसलिए है ताकि हवनकुंड का धुआँ बाहर निकल जाए और मंदिर के भीतर वायु का आवागमन बना रहे। मंदिर के भीतर ऐसी छत की रचना दुर्लभ मानी जाती है। अंतराल की दीवार के समीप गणेश की प्राचीन पाषाण मूर्ति है।
गर्भगृह के द्वार पर नक्काशी की गई है। ललाटबिंब पर गणेश की पाषाण मूर्ति है। दोनों ओर देवताओं की नक्काशीदार पाषाण मूर्तियाँ हैं। गर्भगृह में काटोल शहर की आराध्य देवी चंडिका विराजमान हैं।
देवी के चारों हाथों में शस्त्र हैं। उनके चरणों के पास स्थित असुर का वध करती हुई यह पाषाण मूर्ति है। लगभग ३.५ फुट ऊँची यह प्रतिमा विशेष आकर्षक है। विदर्भ के प्रमुख नवरात्रोत्सवों में यहाँ का उत्सव भी शामिल है। नागपुर सहित विदर्भ के हज़ारों श्रद्धालु देवी के दर्शन के लिए यहाँ आते हैं। नवरात्र के ९ दिनों में यहाँ विशाल मेले का आयोजन होता है।
प्रमुख विशेषताएँ
काटोल बस स्टेशन से १.५ किमी तथा नागपुर से ६० किमी दूरी पर।
काटोल के लिए नागपुर जिले के अनेक भागों से एसटी सेवा उपलब्ध।