‘विदर्भ की अयोध्या’ के रूप में प्रसिद्ध नागपुर जिले के रामटेक नगर में अनेक प्राचीन मंदिर हैं। श्रीराम के निवास से पुनीत रामटेक किले की तलहटी में, विद्या के आराध्य देव गणेश का प्रसिद्ध मंदिर है। इस मंदिर में स्थापित १८ भुजाओं वाली गणेश-पाषाण प्रतिमा देश में अद्वितीय मानी जाती है। विदर्भ के अष्टविनायकों में से एक यह अठारहभुजा गणेश मंदिर है। यह मंदिर नागपुर सहित समस्त विदर्भ के श्रद्धालुओं का प्रमुख श्रद्धास्थान है। यह स्थान जागृत एवं मनोकामना पूर्ण करने वाले गणेश के रूप में प्रसिद्ध है। अतः गणेशोत्सव के अवसर पर हजारों श्रद्धालुगण यहाँ दर्शन हेतु आते हैं।
रामटेक नगर के मध्यवर्ती क्षेत्र शास्त्री वार्ड में, रामगिरि पहाड़ी की तलहटी पर अठारहभुजा गणेश मंदिर स्थित है। विशेष बात यह है कि इस एक ही मंदिर में गणेश के तीन रूपों के दर्शन होते हैं। एक किंवदंती के अनुसार रामटेक के एक ब्राह्मण को गणेश ने स्वप्न में दर्शन दिए। गणेशजी ने कहा कि मैं समीप की नदी में विद्यमान हूँ। मुझे वहाँ खोज कर मंदिर में प्रतिष्ठित करो। तदनुसार खोज करने पर १८ भुजाओं वाली गणेश-पाषाण प्रतिमा प्राप्त हुई। विधिपूर्वक उसकी प्रतिष्ठा की गई। तभी से इस गणेश की पूजा-अर्चना आरंभ हुई। लगभग ५०० साल पूर्व नागपुर के चांदरायण परिवार के पूर्वजों द्वारा इस मंदिर का निर्माण किया गया था।
ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार, १६वीं शताब्दी में राजा रघुजी भोसले ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था। इस मंदिर में तीन गर्भगृह हैं। प्रत्येक गर्भगृह में एक गणेश-पाषाण प्रतिमा स्थापित है। मध्य भाग में महागणपति की लगभग ५.५ पद ऊँची पाषाण मूर्ति है। इसका मुकुट और सूँड़ चाँदी की है। दाहिनी ओर के गर्भगृह में स्थित गणेश-पाषाण प्रतिमा के समीप रिद्धि और सिद्धि की पाषाण मूर्तियाँ हैं। बाईं ओर लगभग ५ पद ऊँची १८ भुजाओं वाली श्वेत संगमरमर की गणेश-पाषाण प्रतिमा है। १८ भुजाओं में से १६ भुजाओं में विविध शस्त्र हैं। एक हाथ में मोदक तथा एक हाथ में मोरपंख की लेखनी है। आस्था है कि विद्यार्थी यदि इस गणेश की पूजा करें, तो उन्हें विद्या का विशेष लाभ होता है। अन्य हाथों में गदा, बाण, पाश, तोमर (भाला), मुद्गल (गदा जैसा शस्त्र), अंकुश, शूल (त्रिशूल), परिघ (लोहे की छड़ी जैसा शस्त्र) आदि शस्त्र हैं। इस गणेश की सूँड़ वक्राकार है। इनके सिर पर पाँच फनों वाला नाग है। इसके अतिरिक्त गले में नाग तथा कमर पर नागपट्टा है। अठारहभुजा गणेश को उनकी १८ सिद्धियों के कारण शास्त्रों और पुराणों में विघ्नेश्वर कहा गया है।
मंदिर के सभामंडप की दीवारों से लगे स्तंभों पर मुख्य अष्टविनायक की पाषाण मूर्तियाँ अंकित हैं। साथ ही विदर्भ के अष्टविनायक की मूर्तियाँ भी उत्कीर्ण हैं। सभामंडप के दाहिनी ओर महालक्ष्मी की पाषाण मूर्ति है। इसके अतिरिक्त मंदिर के समीप महादेव और मारुति के मंदिर भी स्थित हैं।
सन् १९८० में श्री अगस्ति मुनि आश्रम के महंत गोपालदास महाराज ने मंदिर का कार्य कराया था। उन्होंने इसकी संरक्षक दीवारों तथा अन्य मरम्मत का कार्य कराया। कुछ साल पूर्व नगर के युवाओं ने संगठित होकर अठारहभुजा गणेश मंडल की स्थापना की। उन्होंने मंदिर का नवीनीकरण किया। उसके पश्चात मंदिर को वर्तमान स्वरूप प्राप्त हुआ। विदर्भ के अष्टविनायकों में से एक प्रमुख तीर्थस्थान होने के कारण इस मंदिर में निरंतर श्रद्धालुओं का आगमन होता रहता है। प्रत्येक चतुर्थी को यहाँ हजारों श्रद्धालुगण दर्शन हेतु आते हैं। इस मंदिर की अग्रपूजा का अधिकार आज भी चांदरायण परिवार के पास है। रामटेक की प्रसिद्ध शोभायात्रा का प्रारंभ भी इसी मंदिर से होता है। रामटेक नगर के किसी भी सार्वजनिक कार्य का शुभारंभ यहाँ पूजा-अर्चना कर किया जाता है। हर साल संक्रांति के पश्चात आने वाली चतुर्थी को यहाँ विशाल मेला आयोजित होता है। इस मंदिर को ‘क’ वर्ग तीर्थक्षेत्र में सम्मिलित किया गया है।
प्रमुख विशेषताएँ
नागपुर से ५० किलोमीटर तथा रामटेक बस स्टैंड से १.५ किलोमीटर दूरी पर।
नागपुर से रामटेक हेतु हर घंटे राज्य परिवहन बस सुविधा उपलब्ध।
निजी वाहन सीधे मंदिर तक पहुँच सकते हैं।
तालुका मुख्यालय होने से निवास एवं भोजन के अनेक विकल्प उपलब्ध।