त्र्यंबकेश्वर मंदिर / केशवराजस्वामी मंदिर

पारशिवनी शहर, ता. पारशिवनी, जि. नागपूर

महाराष्ट्रातील सुप्रसिद्ध पेंच व्याघ्र प्रकल्पाजवळ पारशिवनी शहराच्या मध्यवर्ती भागात यादवकालीन दोन मंदिरे आजही सुस्थितीत उभी आहेत. यापैकी एक त्र्यंबकेश्वर, तर दुसरे केशवराजस्वामी मंदिर होय. पेंच नदी काठावर वसलेल्या पारशिवनी येथील या मंदिरांमध्ये यादवकालीन बांधकामशैली कलाकुसर पाहायला मिळते.

येथील त्र्यंबकेश्वर मंदिर हे पूर्वाभिमुख असून मंदिराभोवती तटभिंती आहेत. या मंदिराचे बांधकाम त्रिदल (एकाच मंदिरात तीन गर्भगृह) पद्धतीचे आहे. प्रत्येक गर्भगृहावर एक अशी तीन मुख्य शिखरे, सभामंडप आणि अर्धमंडपाच्या वर प्रत्येकी एक अशी एकूण पाच शिखरे आहेत. या प्रत्येक शिखरावर कळस आणि आमलक (शिखराच्या वर आणि कळसाच्या खालील बाजूस असलेला गोलाकार, आवळ्यासारखा दिसणारा भाग) आहे. या मंदिराचे वैशिष्ट्य असे की येथील गर्भगृहावरील शिखरांमध्ये प्रत्येकी एक असे तीन कक्ष आहेत.भूमि से कुछ ऊँचाई पर बने इस मंदिर में मुखमंडप, सभामंडप, अंतराल और तीनभूमि से कुछ ऊँचाई पर बने इस मंदिर में मुखमंडप, सभामंडप, अंतराल और तीनभूमि से कुछ ऊँचाई पर बने इस मंदिर में मुखमंडप, सभामंडप, अंतराल और तीन या तीनही शिखरांच्या कळसांपासून ते खाली जमिनीपर्यंतच्या भिंतींवर अनेक शिल्पे कारलेली आहेत.

जमिनीपासून काहीसे उंचावर असलेल्या या मंदिराचे मुखमंडप, सभामंडप, अंतराळ तीन गर्भगृह असे स्वरूप आहे. येथील सभामंडपात बारा स्तंभ असून त्यापैकी काही जोडस्तंभ (दोन स्तंभ एकत्र) आहेत. सभामंडपात गणेश विष्णू यांच्या प्राचीन प्रतिमा आहेत. सभामंडपाच्या वितानावरील (छत) नक्षीकाम वैशिष्ट्यपूर्ण आहे. येथील विष्णूमूर्ती पांढऱ्या दगडातून घडविलेली असून ती अत्यंत आखीव रेखीव आहे. विष्णूंच्या चार हातांमध्ये शंख, चक्र, गदा पद्म आहेत. डोक्यावर बारीक नक्षीदार मुकुट विविध अलंकार धारण केलेली ही मूर्ती आहे.

मुख्य गर्भगृहासमोर अंतराळाजवळ एका चौथऱ्यावर नंदीची मूर्ती आहे. अंतराळात दोन्ही बाजूला देवकोष्टके असून मुख्य गर्भगृहाच्या प्रवेशद्वारावर कोरीव नक्षीकाम आहे. त्यामध्ये वाद्यवृंद शाखा, स्तंभ शाखा आणि पुष्पलता शाखा कोरलेल्या आहेत. ललाटबिंबावर (गर्भगृहाच्या द्वारपट्टीवर मध्यभागी असणारी जागा) गणेशमूर्ती असून त्याच्या दोन्ही बाजूला कीर्तिमुख कोरलेले आहेत. अंतराळापासून काहीशा खोलवर असलेल्या मंदिराच्या मुख्य गर्भगृहात प्राचीन शिवलिंग आहे. अशा प्रकारच्या गर्भगृहाला पाताळलिंगी गर्भगृह म्हटले जाते. इतर दोन गर्भगृहांच्या प्रवेशद्वारांची रचना सारखीच असून यांच्या द्वारशाखेवर शैव द्वारपाल दाखविले आहेत. यापैकी एकात गणेशमूर्ती, तर दुसऱ्या गर्भगृहात मातृदेवतेची मूर्ती आहे. मंदिराच्या बाह्य भिंतींवर असणाऱ्या देवकोष्टकांमध्ये विष्णू, शिव चामुंडा यांच्या प्रतिमा असून काही कोष्टके रिक्त आहेत.

त्र्यंबकेश्वर मंदिरापासून जवळच केशवराजस्वामी मंदिर असून मंदिराभोवती तटभिंती आहेत. उंच चौथऱ्यावर उभारलेल्या या मंदिराची रचना काहीशी वेगळी आहे. या मंदिरात एकच गर्भगृह असून त्यावर मंदिराचे मुख्य शिखर आहे. मुख्य शिखरासमोर सभामंडपावर एक छोटे शिखर त्या पुढे मुखमंडपावर तीन शिखरे अशी एकूण पाच शिखरे आहेत. त्र्यंबकेश्वर मंदिराप्रमाणेच या मंदिरावरही पाच शिखरे आहेत. या मंदिराच्या मुखमंडपावर असलेली तीन लहान शिखरे हे या मंदिराचे वेगळेपण आहे. अशा प्रकारे मुखमंडपावर तीन शिखरे असणे हे दुर्मिळ आहे.

मुखमंडप, सभामंडप गर्भगृह अशी मंदिराची रचना आहे. मुखमंडपातील दगडी स्तंभावर काही आकृत्या कोरलेल्या आहेत. मुखमंडपाच्या दोन्ही बाजूला देवकोष्टके आहेतमुखमंडपातून सभामंडपात प्रवेश करताना लागणाऱ्या प्रवेशद्वारावरही नक्षीकाम आहे. येथील सभामंडपात १६ स्तंभ आहेत. हा सभामंडप बंदिस्त असून येथे हवा खेळती राहावी यासाठी एका लहानशा खिडकीची रचना आहे. सभामंडपात केशवराज स्वामींची चतुर्भुज मूर्ती आहे. केशवराज स्वामी हे विष्णूंचे एक रूप मानले जाते. ही मूर्ती या मंदिरातील मूळ मूर्ती होती; परंतु ती काहीशी खंडित झाल्यामुळे नवीन मूर्तीची गर्भगृहात प्रतिष्ठापना करण्यात आली ही मूर्ती सभामंडपात ठेवण्यात आली. या मूर्तीच्या प्रभावळीवर दशावतार, गंधर्व, यक्ष, अप्सरा, मगर व्याल अशी शिल्पे कोरलेली आहेत. सभामंडपापुढे असलेल्या अंतराळातून गर्भगृहाकडे जाताना तेथील प्रवेशद्वारावर वैशिष्ट्यपूर्ण नक्षीकाम असून ललाटबिंबावर गणेशमूर्ती आहे. द्वारशाखेच्या दोन्ही बाजूस स्त्रीपुरुषांची युगुल शिल्पे आहे. गर्भगृहात चौथऱ्यावर केशवराज स्वामींची नवीन मूर्ती आहे.

गर्भगृहाच्या बाह्य भागावर अनेक शिल्पे कोरली असून त्यामध्ये सूरसुंदरी अनेक देवतांच्या मूर्ती आहेत. यादव काळातील मंदिराच्या तुलनेत या मंदिरावर फारसे शिल्पांकन दिसत नसले तरीही मंदिर अजूनही भक्कम आहे. केशवराजस्वामी मंदिराची भोसले राजवटीत एकदा दुरुस्ती झाली असावी, असे सांगितले जाते.

उपयुक्त माहिती:

  • दोन्ही मंदिरे पारशिवनी बस स्थानकापासून पायी १० मिनिटांवर
  • नागपूरपासून ३५ किमी अंतरावर
  • खासगी वाहने दोन्ही मंदिरांपर्यंत जाऊ शकतात
  • परिसरात निवास न्याहरीसाठी अनेक पर्याय

त्र्यंबकेश्वर मंदिर / केशवराजस्वामी मंदिर

पारशिवनी शहर, तह. पारशिवनी, जि. नागपुर

महाराष्ट्र के सुप्रसिद्ध पेंच बाघ परियोजना के समीप पारशिवनी शहर के मध्य भाग में यादवकालीन दो मंदिर आज भी सुव्यवस्थित स्थिति में स्थित हैं। इनमें एक त्र्यंबकेश्वर और दूसरा केशवराजस्वामी मंदिर है। ये मंदिर पेंच नदी के तट पर स्थित हैं। इन मंदिरों में यादवकालीन स्थापत्य शैली और कलाकारी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

यहाँ का त्र्यंबकेश्वर मंदिर पूर्वाभिमुख है। इसके चारों ओर परकोटे की दीवारें हैं। इस मंदिर का निर्माण त्रिदल पद्धति से किया गया है। इसका अर्थ है कि एक ही मंदिर में तीन गर्भगृह हैं। प्रत्येक गर्भगृह पर एक-एक मुख्य शिखर बना है। सभामंडप और अर्धमंडप के ऊपर भी एक-एक शिखर है। इस प्रकार यहाँ कुल पाँच शिखर हैं। प्रत्येक शिखर पर कलश और आमलक स्थित है। आमलक शिखर के ऊपर और कलश के नीचे का गोलाकार भाग होता है। इस मंदिर की विशेषता यह है कि यहाँ के गर्भगृहों के शिखरों में तीन कक्ष बने हैं। इन तीनों शिखरों के कलशों से लेकर नीचे जमीन तक की दीवारों पर अनेक शिल्प उकेरे गए हैं।

भूमि से कुछ ऊँचाई पर बने इस मंदिर में मुखमंडप, सभामंडप, अंतराल और तीनभूमि से कुछ ऊँचाई पर बने इस मंदिर में मुखमंडप, सभामंडप, अंतराल और तीन गर्भगृह हैं। यहाँ के सभामंडप में बारह स्तंभ हैं। इनमें से कुछ युग्मस्तंभ हैं। सभामंडप में श्रीगणेश और भगवान विष्णु की प्राचीन पाषाण मूर्तियाँ हैं। सभामंडप की छत पर की गई नक्काशी अत्यंत विशेष है। यहाँ की विष्णु मूर्ति श्वेत पाषाण से निर्मित है। यह मूर्ति अत्यंत सुसज्जित और मनोहर है। भगवान विष्णु के चार हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म हैं। उनके मस्तक पर बारीक नक्काशीदार मुकुट और विविध आभूषण सुशोभित हैं।

मुख्य गर्भगृह के सामने अंतराल के समीप एक चबूतरे पर नंदी की पाषाण मूर्ति है। अंतराल में बाईं और दाईं ओर देवकोष्टक बने हैं। मुख्य गर्भगृह के प्रवेशद्वार पर उत्कीर्ण नक्काशी की गई है। इसमें वाद्यवृंद शाखा, स्तंभ शाखा और पुष्पलता शाखा उकेरी गई हैं। ललाटबिंब पर गणेश मूर्ति है। उसके दोनों ओर कीर्तिमुख अंकित हैं। अंतराल से कुछ भीतर स्थित मंदिर के मुख्य गर्भगृह में प्राचीन शिवलिंग है। ऐसे गर्भगृह को पाताललिंगी गर्भगृह कहा जाता है। अन्य दो गर्भगृहों के प्रवेशद्वारों की रचना समान है। इनके द्वारशाखाओं पर शैव द्वारपाल दिखाए गए हैं। इनमें से एक में गणेश मूर्ति तथा दूसरे गर्भगृह में मातृदेवी की पाषाण मूर्ति है। मंदिर की बाहरी दीवारों पर बने देवकोष्टकों में विष्णु, शिव और चामुंडा की पाषाण मूर्तियाँ हैं। कुछ कोष्ठक रिक्त हैं।

त्र्यंबकेश्वर मंदिर के समीप ही केशवराजस्वामी मंदिर है। इसके चारों ओर भी परकोटे की दीवारें हैं। यह मंदिर ऊँचे चबूतरे पर निर्मित है। इसकी रचना कुछ भिन्न है। इसमें एक ही गर्भगृह है जिस पर मुख्य शिखर बना है। मुख्य शिखर के सामने सभामंडप पर एक छोटा शिखर है। उसके आगे मुखमंडप पर तीन शिखर हैं। इस प्रकार यहाँ भी कुल पाँच शिखर हैं। त्र्यंबकेश्वर मंदिर की भाँति इस मंदिर पर भी पाँच शिखर हैं। इसके मुखमंडप पर स्थित तीन छोटे शिखर इसकी विशेषता हैं। मुखमंडप पर तीन शिखर होना अत्यंत दुर्लभ है।

मंदिर की रचना में मुखमंडप, सभामंडप और गर्भगृह शामिल हैं। मुखमंडप के दो पत्थर के स्तंभों पर कुछ आकृतियाँ उकेरी गई हैं। मुखमंडप के बाईं और दाईं ओर देवकोष्टक हैं। मुखमंडप से सभामंडप में प्रवेश करते समय द्वार पर भी नक्काशी दिखाई देती है। यहाँ के सभामंडप में 16 स्तंभ हैं। यह सभामंडप बंद है। यहाँ वायु के संचार के लिए एक छोटी सी खिड़की बनाई गई है। सभामंडप में केशवराज स्वामी की चतुर्भुज पाषाण मूर्ति है। केशवराज स्वामी को भगवान विष्णु का ही एक रूप माना जाता है। यह पाषाण मूर्ति मंदिर की मूल मूर्ति थी। इसके कुछ अंश खंडित हो जाने के कारण गर्भगृह में नई पाषाण मूर्ति की प्रतिष्ठा की गई। पुरानी मूर्ति को अब सभामंडप में स्थापित किया गया है। इस मूर्ति के प्रभामंडल पर दशावतार, गंधर्व, यक्ष, अप्सरा, मगर और व्याल की शिल्पाकृतियाँ उकेरी गई हैं। सभामंडप के आगे स्थित अंतराल से गर्भगृह की ओर जाते समय प्रवेशद्वार पर विशिष्ट नक्काशी है। ललाटबिंब पर गणेश मूर्ति है। द्वारशाखाओं के दोनों ओर स्त्री-पुरुष की युग्म पाषाण मूर्तियाँ हैं। गर्भगृह में चबूतरे पर केशवराज स्वामी की नई पाषाण मूर्ति प्रतिष्ठित है।

गर्भगृह के बाहरी भाग पर अनेक शिल्प उकेरे गए हैं। इनमें सुरसुंदरी और अनेक देवताओं की पाषाण मूर्तियाँ हैं। यादवकालीन अन्य मंदिरों की तुलना में इस मंदिर पर शिल्पांकन कम दिखाई देता है। तथापि यह मंदिर आज भी सुदृढ़ है। कहा जाता है कि केशवराजस्वामी मंदिर की भोंसले शासनकाल में एक बार मरम्मत की गई थी।

प्रमुख विशेषताएँ

  • दोनों मंदिर पारशिवनी बस स्टैंड से पैदल 10 मिनट की दूरी पर हैं।
  • ये नागपुर से 35 किमी दूर स्थित हैं।
  • निजी वाहन दोनों मंदिरों तक पहुँच सकते हैं।
  • परिसर में ठहरने और जलपान के लिए अनेक विकल्प उपलब्ध हैं।
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