महाराष्ट्र के वारकरी संप्रदाय तथा कर्नाटक के हरिदास संप्रदाय में विठ्ठल को प्रमुख आराध्य देवता माना जाता है। विष्णु के अवतार और कृष्ण के स्वरूप में पूज्य विठ्ठल भगवान ‘विठोबा’, ‘पांडुरंग’ और ‘पंढरीनाथ’ आदि नामों से विख्यात हैं। जब विठ्ठल या पांडुरंग का नाम लिया जाता है, तो एक छवि मन में उभरती है। वे कटि पर दोनों हाथ टिकाए, ईंट पर खड़े, साँवले, मनोहर और आकर्षक स्वरूप में दिखते हैं।
लेकिन अहिल्यानगर जिले के टाकलीभान गाँव में स्थित विठ्ठल की मूर्ति विलक्षण है। इस मूर्ति की चार भुजाएँ हैं और एक घनी मूँछ भी है। इनमें दो भुजाएँ कटि पर हैं। एक हाथ में शंख और दूसरे में चक्र है। यह मूर्ति लगभग 1600 वर्ष पुरानी मानी जाती है। ऐसी मूर्ति महाराष्ट्र में अन्यत्र कहीं नहीं पाई जाती है।
नेवासा से श्रीरामपुर मार्ग पर स्थित टाकलीभान गाँव अपने इस प्राचीन विठ्ठल-रुक्मिणी मंदिर के कारण ‘प्रति-पंढरपुर’ के नाम से प्रसिद्ध है। यह मंदिर यादवकालीन है। यह अपनी विशेष मूर्ति के लिए चर्चित है। जनश्रुति के अनुसार यादवकाल में भान नामक राजा यहाँ का शासक था। वह पांडुरंग का परम भक्त था। उस समय गाँव का नाम टाकली था। भान राजा के निवास के पश्चात इसका नाम टाकलीभान पड़ा।
तब यहाँ चतुर्भुज विठ्ठल की एक अनोखी मूर्ति थी। इसके मस्तक पर शिवलिंग और होंठों पर मूँछ थी। इतिहासकारों के अनुसार यह मूर्ति यादव काल से भी पूर्व की है। इस संदर्भ में एक अभिलेख पंढरपुर में भी मिला है। महाद्वार मार्ग पर स्थित पुलिस चौकी भवन में शिलालेख लगा है। इस लेख के अनुसार, यह देवगिरि के यादव शासक महादेवराव यादव के काल का है। इसकी तिथि ज्येष्ठ शुक्ल 11, शक 1192 (ई. स. 1270) बताई जाती है। उसमें उल्लेख है कि भीमा तट पर काश्यप गोत्रीय, केशवपुत्र भानु ने आप्तोर्याम यज्ञ किया था। ऐसा माना जाता है कि यह भानु ब्राह्मण कुल में जन्मा वही भान यादवकालीन सामंत था।
कई विद्वानों ने इस मूर्ति की निर्माण तिथि लगभग 1600 वर्ष पूर्व की मानी है। शोधकर्ताओं ने यह निष्कर्ष निकाला है कि टाकली उस समय भानु राजा की राजधानी रही होगी। पंढरपुर की तर्ज पर यहाँ आषाढ़ी उत्सव भी आषाढ़ शुद्ध प्रतिपदा से पूर्णिमा तक आयोजित होता है। यह भी माना जाता है कि पंढरपुर और टाकलीभान की विठ्ठल मूर्तियाँ एक ही कालखंड में निर्मित हुई होंगी। प्रसिद्ध इतिहासकार रा. चिं. ढेरे ने भी इस मूर्ति पर गहन अध्ययन कर इसका महात्म्य वर्णित किया है। महानुभाव संप्रदाय के स्थानपाठी व लीलाचरित्र जैसे ग्रंथों में भी इस मंदिर का उल्लेख 13वीं शताब्दी के यादवकाल से संबंधित रूप में मिलता है।
गाँव के मध्य स्थित एक छोटी-सी पहाड़ी पर यह मंदिर स्थित है। सन् 1977 में हुए जीर्णोद्धार के पश्चात मंदिर को वर्तमान स्वरूप प्राप्त हुआ। यह हेमाडपंती शैली में निर्मित पूर्ण पत्थर का मंदिर है। इसमें उत्कृष्ट शिल्पकारी की गई है। मंदिर की संरचना सभामंडप, अंतराल और गर्भगृह में विभाजित है। सभामंडप की दीवारों पर बने देवकोष्टकों में श्रीगणेश और विभिन्न संतों की मूर्तियाँ हैं। इनमें संत नामदेव, संत जनाबाई, पांडुरंग और संत गोरोबा काका सम्मिलित हैं। संत चोखामेला, संत नरहरी सोनार, संत सावता माली, संत कैकाडी महाराज और गंगागिरी महाराज की मूर्तियाँ भी यहाँ हैं। समर्थ सद्गुरु किसनगिरी बाबा, संत सेना महाराज, संत रोहिदास, महामुनि मातंगऋषि और संत जगनाडे महाराज की संगमरमर की मूर्तियाँ यहाँ प्रतिष्ठित हैं।
अंतराल के दो मनोहर नक्काशीदार स्तंभों के पास हनुमान एवं गरुड़ की मूर्तियाँ हैं। गर्भगृह के द्वार पर अद्वितीय शिल्पकारी की गई है। गर्भगृह के चतुर्थ तल पर विराजमान विठ्ठल और रुक्मिणी की मूर्तियाँ विशिष्ट रूप से आकर्षक हैं। चतुर्भुज विठ्ठल के होठों पर मूँछ और मस्तक पर शिवलिंग है। उनकी छाती पर कौस्तुभ मणि है। उनके पार्श्व में रुक्मिणी माता की मनोहर मूर्ति है।
यहाँ पर संत भानुदास का यह अभंग मूर्ति की भव्यता को अत्यंत मनोहर रूप में चित्रित करता है:
चतुर्भुज मूर्ति लावण्य रूपड़े । पाहतां आवडे जीवा बहू ॥
वैजयंती माला, कीरीट-कुंडलें । भूषण मिरवले मकराकार ॥
कासे सोनसळा, पीतांबर पिवळा । कस्तुरी का तिलक शोभे माथे ॥
शंख-चक्र हाती, पद्म तें शोभले । भानुदासे वंदिले चरणकमळ ॥
यह अभंग टाकलीभान के विठ्ठल स्वरूप का संपूर्ण वर्णन करता है।
आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा से पूर्णिमा तक चलने वाले उत्सव में मंदिर प्रांगण को सजाया जाता है। हर दिन गाँववासी अन्नदान करते हैं। सायंकाल 5 बजे प्रतिदिन विठ्ठल-रुक्मिणी की पालकी गाँव में प्रदक्षिणा लगाती है। इसके पश्चात मंदिर में आरती होती है और महाप्रसाद वितरित किया जाता है। चतुर्दशी के दिन भंडारा आयोजित होता है। इसमें टाकलीभान व आसपास के गाँवों की भजन मंडलियाँ ताल, मृदंग और वीणा सहित मंदिर में हाजिरी लगाती हैं। पूर्णिमा के दिन दही हांडी कार्यक्रम के साथ यह उत्सव संपन्न होता है।
मुख्य विशेषताएँ:
श्रीरामपुर से 14 किमी और अहिल्यानगर से 60 किमी की दूरी।
श्रीरामपुर और नेवासा से राज्य परिवहन बस सेवा उपलब्ध है।