कोल्हार, अहिल्यानगर-मनमाड मार्ग पर अमृतवाहिनी प्रवरा नदी के तट पर स्थित एक ग्राम है। यह अपने प्राचीन कोल्हालेश्वर मंदिर, विठोबा-रुक्मिणी मंदिर, हनुमान मंदिर और भगवती माता मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। इस ग्राम का नाम कोल्हालेश्वर मंदिर के कारण पड़ा है। कहा जाता है कि वनवास के दौरान श्रीराम ने यहाँ स्वयं बालू से एक शिवलिंग स्थापित किया था। कोल्हालेश्वर मंदिर अत्यंत प्राचीन है। इसका शिखर 90 पद ऊँचा है।
कोल्हार ग्राम की किंवदंती के अनुसार, समुद्र मंथन से प्राप्त अमृत जिस स्थान पर देवताओं को वितरित किया गया था, वह नेवासा के निकट स्थित है। अमृत वितरण के समय असुरों ने वहाँ भारी कोलाहल किया था। इसी कोलाहल के कारण इस ग्राम का नाम ‘कोल्हार’ पड़ा। इस अराजकता को समाप्त करने के लिए महादेव यहाँ प्रकट हुए। उन्होंने देवी को समस्त असुरों का संहार करने का निर्देश दिया। तब से इस स्थान को कोल्हालेश्वर के नाम से जाना जाता है।
एक अन्य किंवदंती के अनुसार, वनवास के समय श्रीराम, लक्ष्मण और सीता प्रवरा नदी के तट पर ठहरे थे। उस समय दैनिक पूजा हेतु श्रीराम ने नदी की बालू से एक शिवलिंग स्थापित कर उसकी उपासना की। इसी समय महादेव प्रकट हुए। उन्होंने श्रीराम से कहा कि वे इसी स्थान पर निवास करेंगे। तभी से इस मंदिर को कोल्हालेश्वर कहा जाने लगा। ग्राम का नाम भी संभवतः इसी मंदिर के कारण पड़ा है। यह भी माना जाता है कि माता भगवती ने श्रीराम को दर्शन दिए और दुष्टों के विनाश का आशीर्वाद दिया। कुछ ग्रंथों के अनुसार, संत ज्ञानेश्वर और उनके भाई-बहन ने नेवासा से आलंदी की यात्रा के समय कोल्हार में विश्राम किया था। इसके पश्चात वे आगे बढ़े।
प्रवरा नदी के तट पर स्थित कोल्हालेश्वर मंदिर एक भव्य संरचना है। यह हेमाडपंती शैली में निर्मित है। यह मूल मंदिर 16वीं शताब्दी का है। वर्ष 2016 से 2020 के मध्य हुए जीर्णोद्धार के पश्चात इसे वर्तमान स्वरूप प्राप्त हुआ है। मंदिर परिसर अत्यंत विशाल है और त्र्यंबकेश्वर मंदिर के सदृश है। मंदिर परिसर एक सुदृढ़ दीवार से घिरा हुआ है। इसके बाहर एक बड़ा प्रांगण है, जिसमें शनिदेव का मंदिर स्थित है। वहाँ से मेहराब के मार्ग से 15-20 सीढ़ियाँ चढ़कर मंदिर के मुख्य प्रांगण में प्रवेश किया जा सकता है।
यह क्षेत्र अत्यंत विस्तृत है। मुख्य मंदिर के अतिरिक्त यहाँ छह दिशाओं में छह अन्य मंदिर हैं। इनमें गणपति, श्री दत्त, केशव-गोविंद (चंदन निर्मित स्तंभाकार शिवलिंग), राधा-कृष्ण, पार्वती देवी और रामेश्वर सम्मिलित हैं। मंदिर में नंदीमंडप, सभामंडप और गर्भगृह हैं। मुख्य प्रवेश द्वार से प्रवेश करते ही सम्मुख नंदी की एक विशाल पाषाण मूर्ति है। इसकी कलाकृति अद्भुत है। कहा जाता है कि इस नंदी के पीछे एक सुरंग है। यह सुरंग ग्राम के भगवती देवी मंदिर तक जाती है। सुरंग का प्रथम द्वार महादेव मंदिर के शिवलिंग के नीचे स्थित है। सभामंडप अत्यंत विशाल है। इसके सम्मुख गर्भगृह में महादेव का प्राचीन बालू निर्मित शिवलिंग स्थापित है। गर्भगृह से बाहर निकलने हेतु एक लघु द्वार है। यह द्वार सीधे मंदिर के बाहर निकलता है। मंदिर की बाह्य दीवारों पर विशिष्ट नक्काशी और अनेक मूर्तियाँ उकेरी गई हैं।
श्रावण मास के सोमवार और महाशिवरात्रि के अवसर पर कोल्हालेश्वर क्षेत्र मेले का रूप ले लेता है। यहाँ दर्शन हेतु हजारों श्रद्धालु आते हैं। यह एक जागृत तीर्थ स्थल है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यहाँ 16 सोमवार के व्रत करने से उनकी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। श्रद्धालुगण कोल्हालेश्वर मंदिर में प्रातः 5 बजे से रात्रि 10 बजे तक दर्शन कर सकते हैं। वर्ष 2022 में मुंबई के विक्रोली स्थित कन्नमवार नगर के ‘साईं नाथ मित्र मंडल’ ने सार्वजनिक गणेशोत्सव के अवसर पर अहिल्यानगर जिले के इस कोल्हालेश्वर मंदिर की एक प्रतिकृति निर्मित की थी। इस पहल के लिए उन्हें मुंबई पुलिस द्वारा पुरस्कृत किया गया।
मुख्य विशेषताएँ
राहता से 20 किमी और नेवासा से 7 किमी।
अहिल्यानगर, मनमाड, राहता और शिरडी से राज्य परिवहन की बस सेवा उपलब्ध है।
निजी वाहन मंदिर के पार्किंग स्थल तक पहुँच सकते हैं।
निकटवर्ती भगवती मंदिर में श्रद्धालुओं हेतु भक्तनिवास की सुविधा उपलब्ध है।