अहिल्यानगर जिले में शिर्डी के समीप स्थित वाकडी गाँव यहाँ के खंडोबा मंदिर के कारण “खंडोबाची वाकडी” के नाम से प्रसिद्ध है। ऐसा कहा जाता है कि जेजुरी से बाणाई को लाने हेतु चंदनपुरी जाते समय खंडोबा ने यहाँ विश्राम किया था। इस कारण यह स्थान “प्रति जेजुरी” के रूप में भी जाना जाता है। यहाँ चंपाषष्ठी का उत्सव बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन खंडोबा देवस्थान से निकाली जाने वाली घोड़ों की शोभायात्रा मुख्य आकर्षण होती है। इसमें हजारों श्रद्धालु उपस्थित रहते हैं।
खंडोबा मंदिर से जुड़ी एक किंवदंती के अनुसार महादेव के अवतार खंडोबा ने मणि और मल्ल नामक राक्षसों का वध किया। उन्होंने जेजुरी को अपने वासस्थान के रूप में चुना। कुछ समय पश्चात जब खंडोबा नासिक जिले की मालेगाँव तहसील में स्थित चंदनपुरी से बाणाई देवी को लाने जा रहे थे, तब उन्होंने वाकडी में विश्राम लिया।
उनके साथ उनके हेगडी प्रधान और घोड़े भी थे। यहाँ पहुँचने के बाद उन्होंने हेगडी प्रधान को घोड़ों सहित जेजुरी लौटने को कहा। वे स्वयं चंदनपुरी के लिए निकल पड़े। परंतु स्वामी अकेले जा रहे हैं, यह देखकर वफादार घोड़े दुखी हुए। वे निरंतर गर्दन टेढ़ी कर पीछे देखते हुए लौटने लगे। इसी से इस गाँव का नाम “वाकडी” पड़ा।
वाकडी स्थित यह देवस्थान जागृत माना जाता है। ऐसा विश्वास है कि जेजुरी में किए गए व्रत और मन्नत की पूर्णता इस मंदिर में की जा सकती है। शिर्डी से वाकडी जाने वाले मार्ग पर खंडोबा मंदिर स्थित है। मंदिर परिसर विशाल है। पूरे क्षेत्र में पत्थर का फर्श है। परिसर में कई पूजा सामग्री की दुकानें हैं। मंदिर के प्रांगण में एक दीपमाला है। उसके पास अखंड प्रज्वलित धूनी है। मुख्य मंदिर के दाईं ओर एक बड़े चबूतरे पर खंडोबा के वाहन घोड़े की विशिष्ट मूर्ति है। मंदिर की रचना सभामंडप और गर्भगृह के रूप में की गई है। विशाल सभामंडप में नंदी की मूर्ति विराजमान है।गर्भगृह में खंडोबा, म्हाळसा देवी और बाणाई देवी की त्रिपिंडी स्वरूप की प्रतीकात्मक पाषाण शिला है। इनमें से खंडोबा और म्हाळसा देवी की शिला को चाँदी का मुखौटा पहनाकर वस्त्रालंकार अर्पित किए जाते हैं। प्रतीकात्मक शिला के सम्मुख घोड़े पर सवार खंडोबा और म्हाळसा देवी द्वारा मणि और मल्ल राक्षसों का वध करते हुए मूर्तियाँ स्थापित हैं। बताया जाता है कि ये मूर्तियाँ बाद में स्थापित की गई थीं।
इस मंदिर परिसर में बाणाई देवी और हेगडी प्रधान के भी मंदिर हैं। मंदिर से सटे नए सभामंडप का निर्माण किया गया है। इसमें विभिन्न धार्मिक व सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। यहाँ भाईदूज, मार्गशीर्ष षष्ठी और चैत्र पूर्णिमा को विशाल मेला आयोजित होता है। भाईदूज के दिन जेजुरी से लाई गई अखंड ज्योति से यहाँ की धूनी और दीपमाला के दीपक प्रज्वलित किए जाते हैं। इसी के साथ मेले का प्रारंभ होता है। मार्गशीर्ष महीने के प्रथम दिन से खंडोबा का नवरात्रोत्सव प्रारंभ होता है। यह चंपाषष्ठी तक चलता है। मणि और मल्ल नामक दो राक्षसों को पराजित कर खंडोबा ने जनता को संकटों से मुक्त किया था। इसी घटना की स्मृति में यह उत्सव मनाया जाता है। “यळकोट यळकोट जय मल्हार” के जयघोष के साथ हजारों श्रद्धालु वाकडी पहुँचते हैं। दिनभर यहाँ हल्दी (भंडारा) छिड़कने और तली भरने जैसे अनुष्ठान चलते रहते हैं। इस अवसर पर श्रद्धालु खंडोबा को बैंगन का भरता और भाकरी का नैवेद्य अर्पित करते हैं। इस मेले में घोड़ों की शोभायात्रा निकाली जाती है। इसे देखने के लिए हजारों श्रद्धालु एकत्र होते हैं। चैत्र पूर्णिमा अर्थात हनुमान जयंती पर होने वाले मेले में देवतास्वरूप लाठियों की शोभायात्रा निकाली जाती है।
प्रत्येक दिन प्रातः, दोपहर और सायंकाल के समय खंडोबा की आरती होती है। श्रद्धालु सुबह 5 बजे से रात 8 बजे तक मंदिर में प्रवेश कर खंडोबा के दर्शन कर सकते हैं।
प्रमुख विशेषताएँ:
राहाता से 14 किमी तथा शिर्डी से 19 किमी की दूरी पर स्थित है।
शिर्डी और राहाता से राज्य परिवहन की बस सेवा उपलब्ध है।
निजी वाहन सीधे मंदिर परिसर तक पहुँच सकते हैं।
परिसर में भक्तनिवास व जलपान की सुविधा उपलब्ध नहीं है।