अहिल्यानगर-पुणे राजमार्ग पर स्थित पारनेर तहसील का वालवणे गाँव अपनी प्राचीन कालभैरवनाथ मंदिर की महिमा के कारण विख्यात है। यह देवस्थान शताब्दियों से हजारों श्रद्धालुओं की अटूट श्रद्धा का पावन केंद्र रहा है। इसे जागृत एवं चैतन्यमय माना जाता है। चैत्र कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि को आयोजित होने वाला यहाँ का महामेला अहिल्यानगर जिले के विशालतम आयोजनों में गिना जाता है। यहाँ के कालभैरवनाथ ग्रामवासियों की रक्षा करते हैं। इसी दृढ़ भावना के कारण उन्हें ‘क्षेत्रपाल’ के रूप में भी जाना जाता है।
इस मंदिर की पावन कथा इस प्रकार है। वालवणे के समीप स्थित कामरगाँव से कालभैरवनाथ रथ पर आरूढ़ होकर विहार हेतु प्रस्थान कर रहे थे। वे वालवणे-कामरगाँव की सीमा पर मनोहर प्राकृतिक दृश्य वाले क्षेत्र में कुछ समय विश्राम हेतु ठहरे। उसी समय गाँव की एक चरवाहा कन्या अपनी गायों को लेकर उस क्षेत्र में उपस्थित हुई। उसने तुरंत भगवान कालभैरवनाथ को पहचान लिया। उसने अनन्य भक्तिभाव से उन्हें नमन किया। उस छोटी बालिका की निश्छल भक्ति देख देव प्रसन्न हुए। उन्होंने उसे वर माँगने का निर्देश दिया। इस पर वह कन्या विनयपूर्वक बोली, ‘हे भगवान, मुझे अन्य कुछ भी नहीं चाहिए। केवल आप मेरे साथ मेरे गाँव वालवणे चलिए और वहीं विराजिए। इससे मुझे नित्य आपके चरणों के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हो सके।’ उस बालिका की अभिलाषा सुन भगवान उसके साथ गाँव आने हेतु तैयार हुए। भगवान ने उसे अपने रथ में स्थान दिया। वे दोनों वालवणे गाँव की ओर प्रस्थान करने लगे।
ईश्वर के रथ से उन दोनों का गाँव की दिशा में गमन हो रहा था। तभी कुछ समय के पश्चात रथ का अक्ष (वह भाग जो दोनों पहियों को जोड़ता है और जिस पर संपूर्ण रथ का भार निर्भर होता है) झुक गया। जिस स्थान पर वह अक्ष झुका, वहाँ आज एक जीवंत जल-स्रोत प्रवाहित है। इसके पश्चात कुछ दूरी और तय करने पर वही अक्ष टूट गया। रथ का पहिया अलग होकर गिर पड़ा। वह स्थल वर्तमान में ‘बिरोबा का माल’ नाम से जाना जाता है। इस स्थान पर रथ से गिरा हुआ वह पहिया आज भी ग्रामवासियों ने सुरक्षित संजोकर रखा है।
यद्यपि मूल मंदिर १०वीं शताब्दी का है, तथापि कालचक्र के साथ इसमें कुछ परिवर्तन होते रहे। वर्ष १९७१ में ग्रामवासियों द्वारा जीर्णोद्धार किए जाने के उपरांत मंदिर ने वर्तमान भव्य स्वरूप धारण किया है। इस पुनीत कार्य हेतु लगभग दो करोड़ रुपयों का व्यय हुआ। ऐसा कहा जाता है कि पूर्व में यहाँ का मंदिर केवल गर्भगृह तक सीमित था। इसमें कालभैरवनाथ की पाषाण मूर्ति प्रतिष्ठित थी। इसके बाद उसके सम्मुख अंतराल और उसके आगे सभामंडप जैसे निर्माण कार्य क्रमबद्ध रीति से संपन्न हुए। इसके अतिरिक्त मंदिर के प्रांगण में धार्मिक अनुष्ठानों हेतु एक विशाल सभामंडप निर्मित किया गया है। मंदिर के पीछे की ओर श्री विठ्ठल-रुक्मिणी, श्री दत्त एवं श्री तुलजाभवानी के मंदिर भी सुशोभित हैं।
चैत्र कृष्ण प्रतिपदा को यहाँ के वार्षिक उत्सव का मंगलारंभ होता है। मेले हेतु गाँव के लोग प्रवरा संगम पर जाकर कावड़ के माध्यम से पवित्र जल लाते हैं। इस पावन जल से प्रातःकाल भैरवनाथ का अभिषेक होता है। इसके उपरांत मेला प्रारंभ होता है। अर्धरात्रि १२ बजे देव का पालकी उत्सव निकलता है। पालकी प्रस्थान से पूर्व देव की अनुमति ली जाती है। इसके अनुसार, यहाँ के मध्यम आकार के पत्थर (जिसे स्थानीय भाषा में ‘गोटी’ कहते हैं) को ११ श्रद्धालु एकत्र होकर उठाते हैं। प्रत्येक व्यक्ति केवल अपनी एक उँगली का प्रयोग करता है। यदि वह पत्थर उठ जाए, तो देव की अनुमति प्राप्त मानकर पालकी आगे बढ़ती है। ‘भैरवनाथ के नाम की जयजयकार’ के उद्घोष के साथ शोभायात्रा रात भर चलती रहती है।
मेले के दूसरे दिन मल्लयुद्ध का अखाड़ा सजता है। इसमें ख्यातिलब्ध पहलवान सहभागिता करते हैं। मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी को कालभैरवनाथ जन्मोत्सव का कार्यक्रम भी यहाँ अत्यंत उत्साहपूर्वक मनाया जाता है। उस अवसर पर सात दिनों तक अखंड हरिनाम सप्ताह, भजन एवं कीर्तन जैसे आध्यात्मिक आयोजन होते हैं। उपलब्ध विवरणों के अनुसार, इन दो दिनों में दो लाख से भी अधिक श्रद्धालु कालभैरवनाथ के दर्शन हेतु यहाँ आते हैं।
यहाँ की एक विशिष्ट परंपरा देव से अनुमति माँगने की है। इसके अंतर्गत भक्त अपनी मनोकामना मन में संजोकर मूर्ति की दाईं और बाईं ओर पुष्प अर्पित करते हैं। यदि दाईं ओर का पुष्प नीचे गिर जाए, तो उसे देव की अनुमति माना जाता है। प्रतिदिन सूर्योदय एवं सूर्यास्त के समय मंदिर में कालभैरवनाथ की आरती संपन्न होती है। राज्य सरकार की तीर्थक्षेत्र सूची में इस देवस्थान को ‘क’ श्रेणी प्राप्त है।
प्रमुख विशेषताएँ
अहिल्यानगर से ३१ कि.मी. तथा पारनेर से १५ कि.मी. की दूरी पर
अहिल्यानगर, पुणे एवं पारनेर से राज्य परिवहन की सुलभ सेवा उपलब्ध
निजी वाहन सीधे मंदिर द्वार तक पहुँच सकते हैं
परिक्षेत्र में निवास एवं जलपान की उत्तम व्यवस्था है