अहिल्यानगर जिले के पाथर्डी तहसील के तोंडोली नामक प्राकृतिक रूप से समृद्ध गाँव में स्थित प्राचीन हरिहरेश्वर मंदिर असंख्य श्रद्धालुओं की श्रद्धास्थली है। ऐसा कहा जाता है कि भगवान विष्णु और भगवान शिव यहीं मिले थे और यहीं से वे दोनों कैलाश पर्वत पर गए थे। इसलिए इस मंदिर को ‘हरिहरेश्वर कैलाश गमन मंदिर’ के नाम से जाना जाता है। मंदिर में शिवपिंड पर दो लिंग हैं, जिन्हें भगवान शिव और भगवान विष्णु का प्रतीक माना जाता है।
मंदिर की जनश्रुति है कि भस्मासुर नामक एक राक्षस ने घोर तपस्या की और भगवान शिव को प्रसन्न किया। उसने वरदान माँगा, ‘मैं जिस पर भी हाथ रखूँगा, वह भस्म हो जाए’। भगवान शिव ने ‘तथास्तु’ कहा। उसने वरदान की सत्यता की जाँच करने के लिए भगवान शिव के सिर पर अपना हाथ रखने का प्रयास किया। भस्मासुर से बचने के लिए भगवान शिव इस तोंडोली क्षेत्र में पहुँचे, जो दंडकारण्य का हिस्सा है। उस समय पार्वती ने भगवान विष्णु से महादेव को भस्मासुर से बचाने का अनुरोध किया। महादेव पर आए संकट को टालने के लिए भगवान विष्णु ने मोहिनी (एक सुंदर स्त्री) का रूप धारण किया और भस्मासुर को मोहित कर उसके साथ नृत्य करने लगे। भस्मासुर नृत्य में मग्न था, इसलिए उसने भी उसी तरह नृत्य किया, जैसे भगवान विष्णु नृत्य कर रहे थे। उसे पूरी तरह से मोहित होते देख, विष्णु रूपी मोहिनी ने अपना हाथ अपने सिर पर रख नृत्य करना प्रारंभ किया। भस्मासुर भी उसका अनुकरण करते हुए अपने सिर पर हाथ रखकर नृत्य करने लगा। जैसे ही उसने अपना हाथ अपने सिर पर रखा, भस्मासुर वहीं भस्म हो गया। उसके बाद भगवान शिव और भगवान विष्णु कुछ समय तक तोंडोली में इस स्थान पर रुके और यहाँ से वे कैलाश चले गए। तभी से इस स्थान को हरिहरेश्वर कैलाश गमन मंदिर के नाम से जाना जाने लगा। इस स्थान का उल्लेख ‘शिवलीलामृत’ ग्रंथ के 12वें अध्याय में मिलता है। इसके अनुसार प्राचीन काल से ही इस मंदिर क्षेत्र में कई ऋषि-मुनि तपस्या करते थे।
यह प्राचीन मंदिर तोंडोली गाँव के पास एक पहाड़ की तलहटी में एक झील के पास एक शांत और प्राकृतिक क्षेत्र में स्थित है। मंदिर प्रांगण में कई प्राचीन वृक्ष हैं और शनिदेव, विठ्ठल-रुक्मिणी और गणपति के मंदिर हैं। इन मंदिरों का निर्माण पूरी तरह से पत्थर से किया गया है। मंदिर के प्रवेश द्वार के पास नंदी है और उसके पीछे 4 पद के चौकोर सिंहासन पर कुछ साल पहले छत्रपति शिवाजी महाराज की मूर्ति स्थापित की गई थी। प्रवेश द्वार के दाईं ओर एक प्राचीन गणेश मूर्ति है। इस पूर्वमुखी मंदिर की संरचना एक सभामंडप और एक गर्भगृह की है। सभामंडप में कई पाषाण स्तंभ हैं और उन पर कोई विशेष नक्काशी दिखाई नहीं देती है। यहाँ का गर्भगृह अनोखा है और सभामंडप बड़ा है। इस गर्भगृह में भी पाषाण स्तंभ हैं और उनके बीच में एक बड़ी शिवपिंड है। इस शिवपिंड पर 2 लिंग हैं और इसे महादेव और विष्णु का प्रतीक कहा जाता है।
श्रावण के दूसरे सोमवार को यहाँ मेला आयोजित होता है। महाशिवरात्रि के दिन हज़ारों श्रद्धालु हरिहरेश्वर के दर्शन करने के लिए यहाँ आते हैं। इस दिन यहाँ सुबह से ही भजन-कीर्तन जैसे विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। श्रद्धालु सुबह 7 बजे से रात 9 बजे तक मंदिर में दर्शन कर सकते हैं। हर सुबह 7 बजे आरती की जाती है। महाशिवरात्रि और श्रावण के दूसरे सोमवार को यहाँ महाआरती की जाती है।
प्रमुख विशेषताएँ
यह पाथर्डी से 23 कि.मी. और अहिल्यानगर से 74 कि.मी. दूर है