अहिल्यानगर जिले की गर्भगिरी पर्वत शृंखलाओं में स्थित मांजरसुंभा का गोरक्षनाथ मंदिर नाथ संप्रदाय के साथ-साथ हजारों श्रद्धालुओं का श्रद्धास्थान है। कहा जाता है कि गोरक्षनाथ ने इस स्थान पर 12 वर्ष तक तपस्या की थी। इस कारण इस क्षेत्र को गोरक्षनाथ की तपोभूमि कहा जाता है। संपूर्ण श्रावण मास में यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं को भंडारा (महाप्रसाद) दिया जाता है। कार्तिक शुक्ल त्रयोदशी को गोरक्षनाथ प्रकट दिन समारोह के अवसर पर यहाँ आयोजित होने वाला मेला अहिल्यानगर जिले के सबसे बड़े मेलों में से एक माना जाता है।
‘श्रीनवनाथ भक्तिसागर’ ग्रंथ के 23वें अध्याय में दी गई जानकारी के अनुसार, गुरु मच्छिंद्रनाथ गोरक्षनाथ और बालक मिनीनाथ के साथ औंढा नागनाथ तीर्थ क्षेत्र का दर्शन करके नेवासा-सोनई मार्ग से गर्भगिरी पर्वत की ओर जा रहे थे। इस यात्रा के दौरान उनकी भेंट रानी मैनावती से हुई। उस समय रानी ने मच्छिंद्रनाथ को दक्षिणा के रूप में सोने की एक ईंट दी। मच्छिंद्रनाथ उसे झोली में रखकर आगे बढ़े। यात्रा करते समय मच्छिंद्रनाथ ने सोने की ईंट वाली झोली गोरक्षनाथ को दे दी। झोली में सोने की ईंट देखकर गोरक्षनाथ को लगा कि उनके गुरु को धन का मोह है। इसलिए उन्होंने वह ईंट गर्भगिरी पर्वत से नीचे फेंक दी। उन्होंने उसके बदले उसी भार का एक पत्थर झोली में रख दिया। (यहाँ ईंट जहाँ गिरी, उस गाँव का नाम बाद में ‘सोनई’ पड़ा।)
झोली में सोने की ईंट के स्थान पर पत्थर देखकर मच्छिंद्रनाथ ने आक्रोशित होकर गोरक्षनाथ के प्रति अप्रसन्नता व्यक्त की। इससे गोरक्षनाथ को बुरा लगा। गुरु की अप्रसन्नता दूर करने के लिए उन्होंने अपनी सिद्धियों के बल पर संपूर्ण गर्भगिरी पर्वत को स्वर्ण का बना दिया। उस समय मच्छिंद्रनाथ ने कहा कि रानी मैनावती से यह ईंट लेने का कारण स्वर्ण का मोह नहीं था। उनकी इच्छा तीर्थयात्रा पूर्ण होने के बाद देवी-देवताओं, गंधर्वों और शिष्यों को अन्नदान करने की थी। मच्छिंद्रनाथ का यह उद्देश्य समझने के बाद गोरक्षनाथ ने उनसे क्षमा माँगी। इसके बाद मच्छिंद्रनाथ ने गंधर्वों की सहायता से गर्भगिरी पर्वत के इस गढ़ पर देवी-देवताओं के साथ सभी ऋषियों, मुनियों, गणों, गंधर्वों और नदियों को आमंत्रित किया। उन्होंने संपूर्ण श्रावण मास में अन्नदान किया। इसके बाद उन्होंने यहाँ कुछ वर्ष तक रहकर तपस्या की। तब से यह परंपरा आरंभ हुई और आज भी श्रावण मास में यहाँ अन्नदान किया जाता है।
अहिल्यानगर-वांबोरी मार्ग पर डोंगरगण के निकट स्थित गर्भगिरी पर्वत पर मांजरसुंभा के गोरक्षनाथ गढ़ तक जाने का मार्ग है। तलहटी से गढ़ तक जाने के लिए सोपान मार्ग है। अब सीधे गढ़ तक सड़क भी बनाई गई है। पर्वत पर स्थित भव्य चारदीवारी से घिरे मंदिर के प्रवेश द्वार से अंदर प्रवेश करते समय ऐसा अनुभव होता है जैसे किसी किले में प्रवेश कर रहे हों। मंदिर प्रांगण विशाल है और मध्य में गोरक्षनाथ मंदिर है। दर्शनमंडप, सभामंडप और गर्भगृह इस मंदिर की संरचना हैं। सभामंडप में श्रद्धालुओं की भीड़ को व्यवस्थित करने के लिए दर्शन की पंक्ति की व्यवस्था की गई है। गर्भगृह में एक चबूतरे पर गोरक्षनाथ की काले पाषाण की प्राचीन विशेष मूर्ति है। गर्भगृह के प्रदक्षिणा मार्ग पर हिंगला देवी, श्रीदत्त और मच्छिंद्रनाथ की मूर्तियाँ हैं।
मंदिर के प्रांगण में पत्थर का फर्श है। पूरा परिसर हरियाली से भरा हुआ और शांत प्रतीत होता है। इस परिसर से आसपास के कई गाँवों का विहंगम दृश्य देखा जा सकता है। श्रावण मास में प्रतिदिन प्रातःकाल से पूजा, अभिषेक और पारायण जैसी विधियाँ यहाँ होती हैं। नवनाथ श्रद्धालुओं और देवस्थान की ओर से यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं को भंडारा दिया जाता है। कार्तिक शुक्ल त्रयोदशी को गोरक्षनाथ प्रकट दिन समारोह होता है। उस समय यहाँ बड़ा मेला लगता है। इस अवधि में हजारों श्रद्धालुओं की यहाँ दर्शन के लिए भीड़ होती है। इस दिन भी श्रद्धालुओं के लिए भंडारा होता है। अहिल्यानगर से श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए इस अवधि में ‘मेला विशेष’ राज्य परिवहन की सुविधा होती है। प्रतिदिन सुबह 4 से रात 9 बजे तक श्रद्धालुओं को मंदिर में जाकर गोरक्षनाथ के दर्शन करने की अनुमति है। सुबह 4 बजे और सायंकाल 6 बजे मंदिर में आरती होती है।