अहिल्यानगर जिले के कर्जत शहर के ग्राम देवता गोदड़ महाराज का संजीवन समाधि मंदिर हजारों श्रद्धालुओं की श्रद्धास्थली है। यहाँ कामिका एकादशी (आषाढ़ कृष्ण एकादशी) को आयोजित होने वाला रथोत्सव प्रसिद्ध है। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि इस दिन विठ्ठल वास्तव में पंढरपुर से यहाँ विराजने आते हैं। इस दिन महाराष्ट्र राज्य पुलिस दल द्वारा जुलूस के रूप में पुलिस का सम्मान ध्वज इस मंदिर में लाया जाता है। इसके पश्चात इसकी पूजा की जाती है। यह स्थान जिले में ‘छोटी पंढरी’ के नाम से भी प्रसिद्ध है।
ग्रंथों में वर्णन के अनुसार राजस्थान के उदयपुर राज्य के भीकाजी और कर्जत के तोरडमल परिवार की चंद्रभागा को अमरसिंह नाम का एक पुत्र हुआ। जब अमरसिंह छह से सात वर्ष के थे, तब उनके मन में वैराग्य की भावना जागृत हुई। तभी से वे विठ्ठल भक्ति में लीन रहने लगे। उन्होंने पत्थरों को बजाकर भजन गाना प्रारंभ कर दिया। एक बार उनकी मुलाकात संत एकनाथ महाराज के शिष्य नारायणनाथ से हुई। उन्होंने उन्हें आनंद संप्रदाय में दीक्षित किया। इसके पश्चात उन्होंने अमरसिंह के शरीर पर अपनी गोदड़ी रख दी। उन्होंने कहा कि अब से सभी तुम्हें गोदड़नाथ (गोदड़ महाराज) के नाम से जानेंगे। नारायणनाथ ने उन्हें आशीर्वाद भी दिया। उन्होंने कहा कि वे सातपुड़ा पर्वत पर जाकर तपस्या करें। वहीं उन्हें विठ्ठल के दर्शन होंगे। इसके अनुसार, महाराज ने सातपुड़ा पर्वत पर १७ वर्षों तक कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या के फलस्वरूप उन्हें विठ्ठल-रुक्मिणी के दर्शन हुए।
अनेक स्थानों पर भ्रमण के पश्चात गोदड़ महाराज पंढरपुर पहुँचे। वहाँ एक महिला ने उनका अपमान किया। वे इसे सहन न कर सके। उन्होंने अपने तंबू और अपनी सभी सामग्रियों में आग लगा दी। वे स्वयं को उसमें झोंकने ही वाले थे। तभी वहाँ एक ब्राह्मण आए। उन्होंने गोदड़ महाराज से कहा कि उन्हें अपने गाँव कर्णग्राम (जिसे अब कर्जत कहा जाता है) में जाकर धर्म-प्रचार करना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि जब उचित समय आए, तो वहीं संजीवन समाधि ले लेनी चाहिए। ब्राह्मण ने कहा कि विठ्ठल कामिका एकादशी पर उनसे मिलने आएँगे। इतना कहकर वे वहाँ से अंतर्धान हो गए। महाराज को अनुभव हुआ कि ब्राह्मण कोई और नहीं बल्कि स्वयं विठ्ठल थे।
विठ्ठल के निर्देशानुसार गोदड़ महाराज कर्जत आए। कर्जत में उन्होंने ‘योगसिद्धांत’, ‘जगतारका’, ‘संतविजय’, ‘योगनिर्माण’ और ‘गोदाद रामायण’ ग्रंथों की रचना की। इसके अतिरिक्त उन्होंने दर्शन, अध्यात्म और चिकित्सा जैसे विषयों पर लेखन किया। इसके साथ ही उन्होंने कामिका एकादशी पर विठ्ठल का रथोत्सव प्रारंभ किया। यह परंपरा आज तक निरंतर जारी है।
विठ्ठल द्वारा दिए गए दर्शन के अनुसार, मंगलवार, माघ कृष्ण चतुर्थी (वर्ष १८३७ में) को उन्होंने संजीवन समाधि ली। उस स्थान पर आज एक मंदिर है। उल्लेखनीय है कि गोदड़ महाराज ने समाधि लेने से पूर्व इस मंदिर का निर्माण कराया था। यह मंदिर कर्जत शहर के सघन क्षेत्र में स्थित है। मंदिर की संरचना एक सभामंडप और एक गर्भगृह के रूप में की गई है। सभामंडप में गोदड़ महाराज की दैनिक उपयोग की वस्तुएँ और उनकी पुस्तकें संग्रहित हैं। गर्भगृह में गोदड़ महाराज की विराजमान पाषाण मूर्ति है। महाराज की मूर्ति को श्वेत वस्त्र और पगड़ी पहनाई गई है।
कामिका एकादशी पर यहाँ आयोजित होने वाला रथोत्सव प्रसिद्ध है। विठ्ठल की पाषाण मूर्ति के साथ इस रथ को खींचने के लिए हजारों श्रद्धालु जुलूस में सम्मिलित होते हैं। परंपरा के अनुसार, इस दिन महाराष्ट्र राज्य पुलिस विभाग का ध्वज सम्मान के साथ मंदिर में लाया जाता है। इस अवसर पर यहाँ अनेक पुलिसकर्मी उपस्थित रहते हैं। पंचक्रोशी के कई गाँवों से यहाँ पालकी मेला लाया जाता है। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि इस दिन सबके प्रिय विठ्ठल गोदड़ महाराज से मिलने कर्जत आते हैं। इसलिए कामिका एकादशी पर पूरे कर्जत शहर में गोदड़ महाराज और विठ्ठल के नाम का संकीर्तन किया जाता है। कहा जाता है कि कर्जत के लोग अपनी आजीविका के लिए देश के किसी भी कोने में हों, परंतु इस रथोत्सव के अवसर पर वे कर्जत अवश्य आते हैं। इस उत्सव के अवसर पर मेला लगता है।
इसमें कुश्ती प्रतियोगिताएं आयोजित होती हैं। इस दिन मंदिर में महाप्रसाद में श्रद्धालुओं को ‘शिपी आमटी (दाल)’ दी जाती है। हर साल माघ मास के चतुर्थ दिन गोदड़ महाराज का समाधि समारोह आयोजित किया जाता है। इस दौरान मंदिर में प्रातःकाल से ही पूजा-अर्चना और अभिषेक जैसे अनुष्ठान किए जाते हैं। वर्षप्रतिपदा पर संवत्सर समारोह और हर एकादशी पर पालकी समारोह तथा कीर्तन होता है। श्रद्धालु प्रतिदिन प्रातः ६ बजे से रात १० बजे तक गोदड़ महाराज की समाधि के दर्शन कर सकते हैं।
मुख्य विशेषताएं
कर्जत बस स्टैंड से १० मिनट की पैदल दूरी
अहिल्यानगर से ७० किमी
अहिल्यानगर जिले के कई हिस्सों से कर्जत के लिए राज्य परिवहन सुविधा