महाराष्ट्र का अहिल्यानगर जिला कई विशिष्ट और चमत्कारिक मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ की पाथर्डी तहसील में एक राक्षस के मंदिर की मान्यता है। वहीं अहिल्यानगर तहसील के अगडगाँव में स्थित कालभैरवनाथ मंदिर में पिशाचों का मेला लगता है, ऐसी स्थानीय आस्था है। इसी प्रकार का एक और अनोखा मंदिर, दुर्योधन मंदिर, कर्जत तहसील के दूर्गाँव में स्थित है। ऐसा कहा जाता है कि इसी मंदिर के कारण इस गाँव का नाम दूर्गाँव पड़ा। यह मंदिर संपूर्ण महाराष्ट्र में दुर्योधन का एकमात्र मंदिर माना जाता है।
महाभारत में कौरवों के सबसे बड़े और अत्यंत पराक्रमी राजा दुर्योधन की छवि एक खलनायक के रूप में रही है। किंतु उनमें कई अच्छे गुण भी थे। इन गुणों के कारण भारत के कई स्थानों पर उनकी पूजा की जाती है। कुछ स्थानों पर तो उनके मंदिर भी हैं। (जैसे देहरादून में स्थित कौरव मंदिर और केरल के इडक्कड़ गाँव का दुर्योधन मंदिर प्रसिद्ध हैं।)
राशीन के पास स्थित कुलधरण गाँव के निकट दूर्गाँव एक छोटा–सा गाँव है। जैसे हर व्यक्ति को अपने क्षेत्र के देवस्थान पर आस्था होती है, वैसे ही दूर्गाँव के लोगों के लिए यह दुर्योधन मंदिर आस्था का केंद्र है। हर तीन वर्षों में आने वाले अधिक मास में यहाँ भव्य मेला आयोजित होता है। इसे जिले के प्रमुख मेलों में गिना जाता है।
इस मंदिर के संदर्भ में एक किंवदंती प्रचलित है कि महाभारत के युद्ध के बाद दुर्योधन भीम के भय से घायल अवस्था में था। वह एक सरोवर में पानी के भीतर छिप गया था। भीम जब वहाँ पहुँचा, तो उसने जलदेवी से प्रार्थना की कि वह दुर्योधन को बाहर निकाले। जलदेवी के कहने पर दुर्योधन बाहर आया और तब वहाँ भीम और दुर्योधन में युद्ध हुआ। युद्ध से पहले दुर्योधन ने दूर्गाँव स्थित महादेव मंदिर में जाकर उनकी आराधना की। भगवान महादेव उसकी भक्ति से प्रसन्न हुए। उन्होंने अपने मंदिर के शिखर में उसे कुछ समय के लिए छिपने का स्थान दिया। तभी से माना जाता है कि दुर्योधन का वास इस स्थान पर है।
चूँकि जलदेवी ने दुर्योधन को पानी में स्थान नहीं दिया था, इसलिए उसे जल स्रोतों और बादलों से भरा आकाश अच्छा नहीं लगता। ऐसा कहा जाता है कि यदि बादलों पर दुर्योधन की दृष्टि पड़ जाए, तो वे बिना बरसे ही आगे बढ़ जाते हैं। इससे इस क्षेत्र में सूखे की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। किंतु जब ऐसा होता है, तो मंदिर में स्थापित दुर्योधन की मूर्ति को कुछ समय के लिए बंद कर दिया जाता है। तब वर्षा होने लगती है, ऐसा यहाँ के ग्रामीणों का विश्वास है।
यह मंदिर गाँव की सीमा पर एक मनोहर प्राकृतिक वातावरण में स्थित है। यद्यपि इसे दुर्योधन मंदिर के रूप में जाना जाता है, परंतु इसका मूल मंदिर महादेव का है। यह संपूर्ण मंदिर पाषाणों से बना हुआ है। यह लगभग 4 से 5 पद ऊँचे चबूतरे पर स्थित है। इसकी रचना में सभामंडप और गर्भगृह सम्मिलित हैं। कुछ वर्ष पूर्व मंदिर के सम्मुख एक नया भव्य मंडप भी बनाया गया है। मंदिर में प्रवेश हेतु चार सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं। सभामंडप में नंदी की मूर्ति है और गर्भगृह में दो शिवलिंग हैं। एक चतुष्कोणीय और दूसरा वृत्ताकार है। कहा जाता है कि पूर्वकाल में इस गर्भगृह से एक गुप्त गुफा निकलती थी। वह गाँव की सीमा पर स्थित प्राचीन चिंतामणि मंदिर तक जाती थी।
मंदिर के पास से ऊपर शिखर तक जाने के लिए एक सीढ़ी मार्ग है। शिखर के पास एक प्रवेशद्वार है। इससे भीतर जाने पर मंदिर के शिखर के खोखले भाग में पद्मासन में स्थित दुर्योधन की मूर्ति दिखाई देती है। मंदिर में प्रत्येक श्रावण सोमवार और महाशिवरात्रि के दिन उत्सव आयोजित होता है। इन अवसरों पर हज़ारों श्रद्धालुओं की भीड़ के कारण यहाँ मेला जैसा वातावरण बन जाता है। हर तीन वर्षों में आने वाले अधिक मास में दुर्योधन की भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है। यहाँ के लोग अधिक मास को ‘आगाऊ महीना‘ कहते हैं। उनका मानना है कि दुर्योधन भी ‘आगाऊ‘ (ढीठ/हठी) था, इसलिए इसी माह में उसकी शोभायात्रा निकाली जाती है। इस उत्सव में बड़ी संख्या में श्रद्धालु भाग लेते हैं।
इसके अतिरिक्त अधिक मास के दौरान यहाँ 8 दिन का अखंड हरिनाम सप्ताह आयोजित किया जाता है। राज्य सरकार द्वारा इस स्थान को तीर्थक्षेत्र का ‘क‘ दर्जा प्राप्त है। (जिस देवस्थान पर वर्षभर में 1 लाख से अधिक, किंतु 4 लाख से कम श्रद्धालु दर्शन हेतु आते हैं, उन्हें ‘क‘ दर्जा दिया जाता है।) यहाँ प्रतिदिन सुबह 6 बजे से सायंकाल 6 बजे तक दर्शन किए जा सकते हैं। प्रतिदिन सुबह 7 बजे आरती होती है।
मुख्य विशेषताएँ:
कर्जत से दूरी: 13 किमी, अहिल्यानगर से दूरी: 72 किमी
कर्जत से राज्य परिवहन बस की सुविधा उपलब्ध है।
निजी वाहन सीधे मंदिर तक पहुँच सकते हैं।
परिसर में विश्राम और जलपान की सुविधा उपलब्ध नहीं है।