पारनेर तहसील के कान्हूर पठार के समीप स्थित वडगांव दर्या दर्याबाई और वेल्हाबाई देवी के दो मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। ये मंदिर लगभग 1000 वर्ष प्राचीन हैं और एक–दूसरे के समीप स्थित हैं। इस स्थान की विशेषता यह है कि यहाँ रहने वाले वानरों को देवी की सेना माना जाता है। गाँव में जब कोई विवाह होता है, तो इन वानरों के दल के प्रमुख को पगड़ी बाँधने की परंपरा है। इसके अतिरिक्त गाँव के धार्मिक कार्यक्रमों और विवाह में भोजन की पंक्ति में मनुष्यों के साथ–साथ वानर भी बैठते हैं। यह परंपरा निरंतर चली आ रही है।
दर्याबाई और वेल्हाबाई दोनों बहनें हैं। ऐसी मान्यता है कि दर्याबाई वणी के सप्तशृंगगढ़ की अर्धपीठ हैं, जबकि वेल्हाबाई माहूरगढ़ की रेणुका देवी की पूर्णपीठ हैं। इस स्थान के संदर्भ में एक किंवदंती है कि पारनेर तहसील के पाडली दर्या नामक स्थान से ये दोनों देवियाँ वडगांव दर्या आईं और यहाँ के प्राकृतिक सौंदर्य से संपन्न पर्वतीय क्षेत्र की गुफाओं में उन्होंने निवास किया। बाद में इन देवियों ने महादेव और भैरवनाथ को भी साथ लाकर यहाँ स्थापित किया।
मंदिर परिसर में दो दीपस्तंभ और एक जलकुंड है, जिसे शक्तितीर्थ के नाम से जाना जाता है। कहा जाता है कि दर्याबाई देवी ने यहाँ आने के बाद गंगा को प्रसन्न कर इस स्थान पर अवतीर्ण होने का आह्वान किया। तभी से यह कुंड निरंतर जल से भरा रहता है। कई श्रद्धालु यहाँ विशेष रूप से स्नान करते हैं। मान्यता है कि इससे चर्मरोग समाप्त होते हैं और पुण्य की प्राप्ति होती है।
वडगांव दर्या गाँव हरे–भरे वृक्षों से घिरी एक घाटी में बसा हुआ है। मंदिर परिसर में सीताफल, इमली, जामुन, आम, बबूल, वटवृक्ष और पीपल जैसे विशाल वृक्ष दिखाई देते हैं। मंदिर तक पहुँचने के लिए सीढ़ियों का मार्ग है। वहाँ से 125 सीढ़ियाँ उतरने पर मंदिर प्रांगण में प्रवेश होता है। इस सीढ़ी मार्ग के समीप एक जलप्रपात है और उसके पास एक गुफा भी है। कहा जाता है कि इसकी लंबाई लगभग 1 किलोमीटर है। पिछले कई वर्षों से यह गुफा पत्थरों और मिट्टी से भर गई है, फिर भी अब भी 125 से 150 फीट तक गुफा के अंदर जाया जा सकता है।
मंदिर परिसर पूर्णतः पत्थरों के फर्श से निर्मित है। यह स्थान अत्यंत शांत, स्वच्छ एवं पवित्र है। इसी परिसर की पहाड़ी में दर्याबाई और वेल्हाबाई के मंदिर स्थित हैं। दर्याबाई मंदिर के मुख्य द्वार से भीतर प्रवेश करते ही वहाँ देवी की पाषाण निर्मित स्वयंभू मूर्ति स्थापित है। उसके पास ही शिवलिंग स्थित है।
वहाँ से वेल्हाबाई के मंदिर में जाने के लिए एक छोटा सा द्वार है। किंवदंती है कि वेल्हाबाई ने अपनी बड़ी बहन दर्याबाई के दर्शन हेतु अपनी कोहनी से वह द्वार बनाया था। वेल्हाबाई मंदिर में भी देवी की प्रतीक रूप स्वयंभू मूर्ति है और वहाँ गणेशजी की मूर्ति भी स्थापित है। मंदिर की इस अनूठी रचना के कारण श्रद्धालु पहले दर्याबाई मंदिर से प्रवेश करते हैं और वहाँ से होते हुए वेल्हाबाई मंदिर पहुँचते हैं और फिर वहीं से बाहर निकलते हैं।
मंदिर से कुछ दूरी पर देवस्थान की कृषि भूमि है। वहाँ ग्रामवासी सामूहिक रूप से खेती करते हैं और उससे प्राप्त आय देवी के त्योहारों, धार्मिक अनुष्ठानों तथा वानरों के भोजन के लिए उपयोग की जाती है। ग्रामवासियों का विश्वास है कि यदि कोई व्यक्ति इस व्यवस्था में लापरवाही करता है, तो यह वानरसेना उस व्यक्ति की खेती में जाकर फसलों को नुकसान पहुँचाती है।
यहाँ के सभी ग्रामवासी मानते हैं कि ये सभी वानर देवी के पुत्र तथा उनका सैन्यबल हैं। ये वानर पूरी तरह से मानवों की तरह व्यवहार करते हैं और विवाह या धार्मिक कार्यों में पूरी भागीदारी निभाते हैं। ऐसे अवसरों पर ग्रामवासी उन्हें मान–सम्मान प्रदान करते हैं। वानरों की टोली में प्रमुख वानर को पगड़ी बाँधी जाती है और विशेष बात यह है कि वह वानर बिना हिले–डुले पगड़ी को अपने सिर पर बाँधने देता है। कार्य पूर्ण होने पर वानर उस पगड़ी के कई टुकड़े कर आपस में बाँट लेते हैं। इसके अलावा इनमें से कई वानर भोजन के समय पंक्ति में मनुष्यों के साथ बैठकर भोजन भी करते हैं।
श्रावण शुक्ल अष्टमी को देवी को हल्दी लगाने की परंपरा है। उस दिन सायंकाल परंपरा अनुसार देवी की पालकी और सम्मान के दंड की शोभायात्रा निकाली जाती है। पारंपरिक वाद्ययंत्रों की गूंज के साथ यह शोभायात्रा गाँव से मंदिर तक पहुँचती है। नवरात्रि के समय यहाँ 10 दिन का उत्सव आयोजित किया जाता है। माघ शुक्ल पूर्णिमा को यहाँ भव्य वार्षिक मेले का आयोजन होता है। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि यह स्थान जागृत देवस्थान है।
मुख्य विशेषताएँ
पारनेर से दूरी: 17 किमी, अहिल्यानगर से दूरी: 50 किमी
पारनेर से राज्य परिवहन बस की सुविधा उपलब्ध
निजी वाहन सीधे मंदिर के पार्किंग तक पहुँच सकते हैं
परिसर में जलपान की सुविधा उपलब्ध है; परंतु रात्रि विश्राम की सुविधा नहीं है