ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बालमटाकली गाँव अहिल्यानगर जिले के शेवगाँव तहसील में गेवराई-बीड मार्ग पर स्थित है। बालमटाकली पेशवा और फिर अंग्रेजों के अधीन क्षेत्र का आखिरी गाँव था। वहाँ से आगे निजाम के शासन की सीमा थी। निजाम के क्षेत्र से व्यापार के लिए आने वाले माल पर यहाँ कर वसूला जाता था। इसलिए यह गाँव रक्षा के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण माना जाता था।
बालमटाकली शेवगाँव तहसील में एक महत्वपूर्ण धार्मिक क्षेत्र के रूप में जाना जाता है। श्रद्धालुओं का मानना है कि माहुरगढ़ की देवी का रूप बालमटाकली में अवतरित हुआ है। बालमटाकली मंदिर के साथ-साथ इस गाँव में कई प्राचीन मंदिर हैं। इनमें 1752 में बना विठ्ठल-रुक्मिणी मंदिर, 1759 में बावली का महादेव मंदिर, 1766 में निर्मित पाषाण का दीपस्तंभ और 1785 में बावली पर बना हनुमान मंदिर शामिल हैं। यहाँ इन मंदिरों का एक समूह है। इसके अलावा 13वीं शताब्दी का ताकेश्वर मंदिर और प्राचीन राम मंदिर है। कहा जाता है कि यहाँ की ग्राम देवी बालंबिका देवी के नाम पर ही इस गाँव का नाम ‘बालमटाकली’ पड़ा।
बालंबिका मंदिर की जनश्रुति है कि कुछ साल पहले इस क्षेत्र के गाँवों पर गरुड़ देशमुख परिवार का स्वामित्व था। इस जमींदार की एक बेटी थी, जिसका नाम बाली था। यह बाली बचपन से ही रेणुका देवी की पूजा करती थी। वह अपने माता-पिता से लगातार गाँव में रेणुका देवी का मंदिर बनवाने का हठ करती रहती थी। आठ साल की उम्र में बाली की मृत्यु हो गई। उसकी मृत्यु के बाद भी गाँव वालों को लगा कि वह अभी जीवित है। बाली की मृत्यु के बाद देशमुख की जमीन पर कुआँ खोदने का काम प्रारंभ किया गया। काम चल रहा था, तभी मजदूरों को कुएँ में एक कठोर पाषाण मिला। कई प्रहारों के बावजूद पाषाण नहीं टूटा। फिर जब मजदूरों ने पूरी ताकत से देवी का नाम लेकर पाषाण को घुमाया, तो पाषाण अंदर धँस गया और रक्त बहने लगा। यह दृश्य देखकर मजदूर वहीं मूर्छित हो गया। उसी रात बालूबाई देशमुख परिवार के मुखिया के सपने में आईं और बोलीं, ‘माता रेणुका कुएँ में हैं और उनके सिर पर चोट पहुँची है। आपने मंदिर बनाने का मेरा हठ पूरा नहीं किया, अब आप मंदिर बनाकर उसमें देवी को स्थापित करें।’
ऐसा ही स्वप्न मजदूर को भी हुआ। इसके अनुसार उसने कुशल कारीगरों की मदद से मूर्ति के रूप में देवी को कुएँ से बाहर निकाला। जिस स्थान पर मूर्ति मिली थी, उसी स्थान पर मंदिर का निर्माण किया गया।
बालंबिका देवी का मंदिर बालमटाकली गाँव के मध्य में स्थित है। इस मंदिर की संरचना में एक सभामंडप और एक गर्भगृह है। गर्भगृह के देवकोष्टक पर देवी की मूर्ति 4 पद ऊँची और 3 पद चौड़ी है। उत्सव के दौरान इस देवी को चांदी का मुकुट, साड़ी और कई आभूषण पहनाए जाते हैं। इस मूर्ति के बगल में परशुराम और गणपति की मूर्तियाँ हैं। इस मंदिर का मूल निर्माण काले पाषाण से किया गया था। लेकिन बाद के काल में इसके जीर्णोद्धार के बाद मंदिर को अपना वर्तमान स्वरूप मिला है।
हर साल नवरात्रि के दौरान यहाँ बड़ा उत्सव मनाया जाता है। उस दौरान गाँव में घर-घर व्रत रखे जाते हैं। इसके अलावा सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालु मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं। उत्सव के दौरान सुबह और शाम देवी की आरती के लिए सैकड़ों श्रद्धालु उपस्थित रहते हैं। शाकंभरी पूर्णिमा (पौष पूर्णिमा) को देवी के दर्शन किए जाते हैं। इस अवसर पर यहाँ कुश्ती के मुकाबले होते हैं। इसके लिए पूरे राज्य से कई पहलवान एक महीने पहले से ही बालमटाकली में आकर रुकते हैं और अभ्यास करते हैं। इस दौरान बालमटाकली के ग्रामीण इन पहलवानों को सारी सुविधाएँ प्रदान कराते हैं। कहा जाता है कि यह परंपरा लगभग 200 सालों से चली आ रही है। मनोकामना पूर्ण करने वाली और श्रद्धालुओं के लिए दौड़ती हुई आने वाली बालंबिका देवी को बालमटाकली की ग्राम देवी और क्षेत्र के सैकड़ों गाँवों के श्रद्धालुओं की आराध्य देवी माना जाता है।