प्रवरा नदी के उद्गम स्थल और रतनगढ़ की तलहटी में स्थित प्राचीन अमृतेश्वर मंदिर एक अद्भुत पाषाण-शिल्प है। इसे नक्काशीदार स्थापत्य का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है। महाराष्ट्र में नासिक के निकट गोंदेश्वर, वेरुल का घृष्णेश्वर और अंबरनाथ के शिवालय जैसे कुछ ही विशिष्ट मंदिर हैं। शिखर शिंगणापुर का शंभू महादेव मंदिर और त्र्यंबकेश्वर मंदिर भी इसी श्रेणी में आते हैं। रतनवाडी का अमृतेश्वर मंदिर इन्हीं मनोहर मंदिरों में से एक है। शिलाहार राजा झंज ने गोदावरी से भीमा नदी के बीच 12 शिवालयों का निर्माण किया था। यह उनमें से एक प्रमुख मंदिर माना जाता है।
भारतीय पुरातत्त्व विभाग के अभिलेखों के अनुसार यह मंदिर 12वीं या 13वीं शताब्दी का है। यह भंडारदरा के निकट रतनगढ़ की तलहटी में स्थित है। प्राकृतिक रूप से समृद्ध इस पाषाण मंदिर की संरचना अन्य शिवालयों से भिन्न है। मुख्य मंदिर पश्चिम की ओर है। नंदीमंडप पूर्व की ओर स्थित है। मंदिर में प्रवेश के लिए पूर्व और पश्चिम दोनों दिशाओं में द्वार बने हैं। पूर्व दिशा से प्रवेश करने पर पहले नंदीमंडप आता है। इसके पश्चात सीधे गर्भगृह, अंतराल और अंत में सभामंडप स्थित है। गर्भगृह में प्रवेश और निकास के लिए दोनों दिशाओं में मार्ग दिए गए हैं। इस प्रकार की संरचना अन्य शिवालयों में सामान्यतः नहीं देखी जाती है। यहाँ की एक और विशेषता यह है कि गर्भगृह कुछ गहराई में स्थित है। वहाँ निरंतर जल के प्राकृतिक स्रोत बहते रहते हैं। इसे प्रवरा नदी का उद्गम स्थल माना जाता है। अमृतेश्वर मंदिर से उद्गम होने के कारण इसे ‘अमृतवाहिनी प्रवरा’ भी कहा जाता है। वर्षा ऋतु में मंदिर का गर्भगृह पूर्णतः जल से भरा रहता है। सामान्यतः जून से दिसंबर के मध्य यहाँ का शिवलिंग जलमग्न रहता है।
पश्चिम दिशा से प्रवेश करते समय मुख्य द्वार की नक्काशी ध्यान आकर्षित करती है। प्रवेशद्वार के दोनों ओर के स्तंभों पर बारीक कलाकारी की गई है। यहाँ कई देवी-देवताओं के साथ मैथुन शिल्प भी उकेरे गए हैं। प्रवेशद्वार के ऊपर श्रीराम भक्त गणेश की मूर्ति है। इसके नीचे देवी-देवताओं के साथ कई सुरसुंदरियाँ उकेरी गई हैं। सभामंडप के पाषाण स्तंभ सैकड़ों लघु शिल्पों से सुसज्जित हैं। स्तंभों के ऊपरी भाग में भारवाहक यक्ष बनाए गए हैं। प्रकाश की व्यवस्था के लिए सभामंडप की दीवारों पर स्थान-स्थान पर पाषाण की जालियाँ बनाई गई हैं।
अंतराल से गर्भगृह की ओर जाते समय द्वारपट्टी पर चारों ओर शिल्प अंकित हैं। निचले भाग में कीर्तिमुख और बाईं तथा दाईं ओर बेल-बूटेदार नक्काशी है। अंतराल से गर्भगृह लगभग छह से सात पद गहरा है। वहाँ छह से सात सोपान उतरकर नीचे जाना पड़ता है। गर्भगृह का शिवलिंग भी विशेष है। इसमें जलाधारी के ऊपर शिवलिंग तीन स्तरों में स्थित है। इसका आकार नीचे से ऊपर की ओर संकुचित होता गया है। देखने पर ऐसा प्रतीत होता है जैसे तीन पाषाण एक-दूसरे पर रखे हों। ऐसे शिवलिंग बहुत कम देखने को मिलते हैं। गर्भगृह से पूर्व की ओर बाहर निकलने पर सम्मुख नंदीमंडप है। इस मंडप में नंदी स्थापित हैं। उनके समीप ही दो खंडित नंदी भी रखे गए हैं।
मंदिर की बाहरी दीवारों पर विभिन्न ज्यामितीय रचनाएँ हैं। इनमें देव, दानव, यक्ष, अप्सरा और गंधर्व जैसे कई नक्काशीदार शिल्प हैं। इसके अतिरिक्त विभिन्न स्थानों पर मैथुन शिल्प भी अंकित हैं। मंदिर का शिखर अत्यंत विशेष है। इसमें शिल्पकला की समृद्धि स्पष्ट दिखाई देती है। यहाँ जालीनुमा नक्काशी और शिखरों की लघु प्रतिकृतियों की सुंदर संरचना है। इसे ‘भूमीज’ शैली का मंदिर माना जाता है। प्राचीन स्थापत्य शास्त्र के अनुसार मंदिर शैली के ‘नागर’ और ‘द्रविड़’ दो मुख्य प्रकार हैं। इन दोनों के संगम को ‘वेसर’ उपशैली कहा जाता है। भूमीज शैली वास्तव में नागर शैली की ही एक उपशैली है। इस शैली के मंदिर नर्मदा क्षेत्र और महाराष्ट्र में बड़ी संख्या में मिलते हैं। मंदिर परिसर में कई प्राचीन मूर्तियाँ और शिलालेख स्तंभ स्थित हैं। यहाँ कुछ खंडित मूर्तियाँ भी रखी गई हैं।
मंदिर के निकट एक चौकोर पुष्करणी है। इसमें उतरने के लिए सोपान बने हैं। पुष्करणी की चारों ओर की दीवारों पर छोटे-छोटे मंदिर निर्मित हैं। इनमें गणेश और विष्णु के विभिन्न रूपों की पाषाण मूर्तियाँ स्थापित हैं। स्थानीय लोग इस पुष्करणी को ‘विष्णूतीर्थ’ कहते हैं। वे समुद्रमंथन के 14 रत्नों के साथ इस मंदिर और तीर्थ के प्रकट होने की पौराणिक कथा सुनाते हैं। वर्तमान में यह मंदिर भारतीय पुरातत्त्व विभाग के संरक्षण में है।
महाशिवरात्रि के अवसर पर यहाँ भव्य मेला लगता है। श्रावण मास के सोमवार को भी यहाँ हजारों श्रद्धालु दर्शन हेतु आते हैं। वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण होने के कारण यह मंदिर क्षेत्र के आदिवासी समाज का प्रमुख श्रद्धाकेंद्र है। श्रद्धालु, पर्यटक, इतिहास प्रेमी और शिल्पकला के जिज्ञासु इस मंदिर में अवश्य आते हैं।
प्रमुख विशेषताएँ
अकोले से 49 किमी और भंडारदरा से 15 किमी की दूरी पर।
अकोले से राज्य परिवहन की बस सुविधा उपलब्ध है।
निजी वाहन मंदिर के वाहन स्थल तक जा सकते हैं।
परिसर में भक्तनिवास की सुविधा उपलब्ध नहीं है।
निकटवर्ती भंडारदरा क्षेत्र में ठहरने के कई विकल्प हैं।
मंदिर का स्थान: https://maps.app.goo.gl/UDzBHLtrRGufnmLZ7