पेमाई देवी मंदिर / हनुमान मंदिर महाराष्ट्र का महावटवृक्ष
पेमगिरी, तह. संगमनेर, जि. अहिल्यानगर
संगमनेर से भंडारदरा की ओर जाने वाले मार्ग पर सह्याद्रि की गोद में ऐतिहासिक धरोहर से समृद्ध पेमगिरी गाँव बसा हुआ है। भीमगढ़ और शहागढ़ के नामों से प्रसिद्ध पेमगिरी किला भी इसी गाँव में स्थित है। इस किले पर स्थित पेमाई माता का मंदिर ग्रामवासियों का प्रमुख आस्था केंद्र है। इसके अतिरिक्त गाँव में पूर्णतः सागवान की लकड़ी से निर्मित भव्य दोमंजिला हनुमान मंदिर भी है। इस मंदिर के समीप लगभग 21 पद ऊँची गदा स्थापित की गई है। ऐसा कहा जाता है कि यह देश की सबसे बड़ी गदा है। गाँव की सीमा पर महाराष्ट्र का महावटवृक्ष स्थित है। यह लगभग साढ़े तीन एकड़ में फैला एक विशाल वटवृक्ष है।
अहिल्यानगर जिले की संगमनेर तहसील का एकमात्र किला पेमगिरी है। इसे शहाजी राजे भोसले की वीरता की पहचान माना जाता है। इस किले पर शहाजी राजे और जीजाबाई ने कई वर्षों तक निवास किया था। ऐसा कहा जाता है कि बालक शिवाजी के भी कुछ दिन इस किले पर बीते थे। पेमगिरी किले तक पहुँचने के लिए गाँव से सड़क और सीढ़ी, दोनों मार्ग उपलब्ध हैं। गाँव से किले की ओर जाते समय कुछ दूरी पर ग्रामवासियों द्वारा बनाया गया नया पेमाई देवी मंदिर स्थित है। इसके अतिरिक्त किले पर भी पेमाई देवी का एक प्राचीन छोटा मंदिर है। इस मंदिर के गर्भगृह में शस्त्रधारी देवी की पाषाण मूर्ति है। पाषाण मूर्ति के समीप देवी की प्रतीक स्वरूप शिला है। मंदिर के समीप 4 आयताकार नक्काशीदार जलकुंड हैं। ये सातवाहन काल के माने जाते हैं। इन जलकुंडों में सदैव पानी भरा रहता है। ये सभी जलकुंड अंदर से एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। चैत्र माह की पूर्णिमा पर यहाँ देवी का मेला आयोजित होता है।
पेमगिरी गाँव के मध्य में हनुमान जी का एक मनोहर मंदिर है। यह पूरी तरह सागवान की लकड़ी से बनाया गया है। इस मंदिर की विशेषता यह है कि इसके निर्माण में केवल पत्थर और सागवान की लकड़ी का उपयोग हुआ है। मंदिर की बनावट ऐसी है कि यह किसी भव्य राजमहल जैसा प्रतीत होता है। मंदिर परिसर को चारों ओर से प्राचीर (दुर्ग शैली में) से घेरा गया है। इसके आँगन में एक मनोहर बगीचा विकसित किया गया है। वहाँ कई सजावटी और फूलों के पौधे लगाए गए हैं। इससे यह परिसर शांत और रमणीय लगता है। मंदिर के समीप स्थित लगभग 21 पद ऊँची विशेष नक्काशीदार गदा दर्शनीय है। मंदिर में प्रवेश के लिए 6–7 सीढ़ियाँ चढ़कर सभामंडप में जाना होता है। सभामंडप दोमंजिला है और ऊपर जाने के लिए सीढ़ियाँ भी बनी हैं।
सभामंडप के मध्य में एक चबूतरे पर सिंदूर चढ़ी गदाधारी हनुमान जी की पाषाण मूर्ति स्थापित है। इस पाषाण मूर्ति के पीछे दो गदाएँ उकेरी गई हैं। इस पूरे चबूतरे पर लकड़ी की मनोहर नक्काशी की गई है। चबूतरे के चारों ओर प्रदक्षिणा मार्ग है। इसी सभामंडप में प्रदक्षिणा मार्ग पर दो और मंदिर हैं। इनमें श्रीदत्त और विठ्ठल-रुक्मिणी की पाषाण मूर्तियाँ स्थापित हैं। सभामंडप की ऊपरी और निचली मंजिल की दीवारों पर गाँव की ऐतिहासिक धरोहरों की चित्रात्मक प्रतिकृतियाँ लगाई गई हैं। इनमें पेमगिरी किला, वहाँ प्राप्त पुरातन पाषाण मूर्तियाँ, शस्त्र, गाँव की प्राचीन बावड़ी तथा गाँव की सीमा पर स्थित महावटवृक्ष सम्मिलित हैं। मंदिर परिसर में एक चबूतरे पर शनिदेव की शिला है। गंगाराम तात्याबा दुबे-पाटिल की प्रेरणा से वर्ष 1942 में इस मंदिर का निर्माण कार्य पूर्ण हुआ था। इसके लिए सागवान की लकड़ी कोंकण क्षेत्र से लाई गई थी। आज 80 वर्षों के बाद भी यह मंदिर ज्यों का त्यों बना हुआ है। ग्रामवासियों के अनुसार अब तक इसकी किसी मरम्मत की आवश्यकता नहीं पड़ी है।
इस मंदिर से लगभग 2.5 से 3 किलोमीटर की दूरी पर मोरदरा क्षेत्र में महाराष्ट्र का सबसे बड़ा वटवृक्ष स्थित है। यह विशाल वटवृक्ष लगभग साढ़े तीन एकड़ में फैला है। इसका तना 50 से 60 पद के घेरे का है। इसकी जड़ से निकली हुई जटाएँ 100 से अधिक हैं। इनमें से कई जटाएँ जमीन से जुड़कर पुनः तने में परिवर्तित हो गई हैं। ग्रामवासियों के अनुसार यह वटवृक्ष लगभग 250 वर्ष पुराना है। इसकी हज़ारों जटाएँ ज़मीन में फैलकर वृक्ष का विस्तार निरंतर बढ़ा रही हैं। इन सैकड़ों जटाओं के बीच से होकर मूल तने तक पहुँचा जा सकता है। इस तने के समीप ही जाखाई-जाकमत बाबा नामक ग्राम देवता विराजमान हैं।
इस देवता से जुड़ी लोककथा के अनुसार, रामोशी समाज के जाकमत बाबा बकरियों को चराने इस स्थान पर आए थे। उसी समय एक बाघ ने बकरियों के झुंड पर हमला किया। बकरियों को बचाने के लिए जाकमत बाबा बाघ से भिड़ गए। उनकी पुकार सुनकर उनकी बहन जाखाई वहाँ पहुँच गई। जब उसने देखा कि उसका भाई बाघ के चंगुल में है, तो उसने भी बाघ से युद्ध किया। इस संघर्ष में बाघ, जाकमत बाबा और जाखाई—तीनों की मृत्यु हो गई। उन्होंने बाघ से लड़ते समय जिस कुल्हाड़ी के हत्थे का उपयोग किया था, वह आज भी उस वृक्ष में दिखाई देता है। बाद में ग्रामवासियों ने वहाँ जाकमत बाबा और जाखाई की पाषाण मूर्तियाँ स्थापित कीं। ऐसी मान्यता है कि यदि कोई जानबूझकर इस वृक्ष की शाखाएँ तोड़ता है, तो जाकमत बाबा उसे दंड देते हैं। इसलिए यहाँ कोई भी व्यक्ति वृक्ष के पत्तों तक को नहीं छूता। इसी कारण यह वृक्ष एक विशाल वटवृक्ष में परिवर्तित हो गया है। इस महाकाय वटवृक्ष के प्रति ग्रामवासियों की अत्यंत श्रद्धा है। गाँव की इन विशेषताओं के कारण पर्यटक, इतिहास और वनस्पति के शोधकर्ता और श्रद्धालुगण यहाँ नियमित रूप से आते रहते हैं।
मुख्य विशेषताएँ
संगमनेर से 22 किमी तथा अहिल्यानगर से 124 किमी की दूरी पर स्थित।
संगमनेर से पेमगिरी गाँव तक राज्य परिवहन (एसटी) सेवा उपलब्ध है।
निजी वाहन पेमगिरी किला, हनुमान मंदिर और महावटवृक्ष तक जा सकते हैं।
क्षेत्र में निवास और जलपान की सुविधा उपलब्ध नहीं है।