अहिल्यानगर जिले की संगमनेर तहसील के अंतर्गत अकलापुर गाँव स्थित है। यह गाँव अपने जागृत एकमुखी दत्त मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। यह स्थान लगभग 1200 साल पुराना है। यह प्राचीन और स्वयंभू है। इस मंदिर की एक विशेषता है। यहाँ हर गुरुवार और पूर्णिमा के दिन साबूदाने की खिचड़ी का महाप्रसाद वितरित किया जाता है। यह महाप्रसाद बहुत प्रसिद्ध है। इस अन्नदान के लिए पंजीकरण करना पड़ता है। पंजीकरण के बाद दानशील श्रद्धालुओं को लगभग छह साल की प्रतीक्षा करनी पड़ती है। दिन-प्रतिदिन प्रतीक्षा सूची की अवधि बढ़ती जा रही है। यहाँ दत्त जयंती का एक बहुत बड़ा उत्सव होता है। इस दिन लगभग तीन लाख श्रद्धालु श्री दत्त के दर्शन हेतु आते हैं।
मंदिर की कथा इस प्रकार है। राहुरी तहसील के ताहराबाद क्षेत्र में संत श्री महिपति महाराज रहते थे। उनके तालवादक कोंडाजी बाबा को श्री दत्त ने स्वप्न में दर्शन दिए। उन्होंने बताया कि वे अकलापुर गाँव के पास स्थित अनुसया पहाड़ी पर विराजमान हैं। इसके बाद कोंडाजी बाबा ने ग्रामवासियों की सहायता से वहाँ खोजबीन की। तब श्री दत्त की मनोहर एकमुखी पाषाण मूर्ति प्राप्त हुई। यह मूर्ति वालुकामय है। यह दिन वैशाख शुक्ल द्वादशी का था। इसके बाद ग्रामवासियों ने अकलापुर में एक छोटा मंदिर निर्मित किया। उन्होंने उसमें इस मूर्ति की प्रतिष्ठापना की।
एक अन्य कथा के अनुसार संत ज्ञानेश्वर अपने भाई-बहनों के साथ पैठण से आलंदी की ओर जा रहे थे। इस मेले जैसी यात्रा में उनके साथ एक बैल था। रास्ते में बैल थक गया था। इस कारण वे दो दिन इस स्थान पर रुके थे।
अकलापुर स्थित अनुसया पहाड़ी की तलहटी में इस मंदिर का विस्तृत परिसर है। हाल ही में निर्मित एक मनोहर तोरण से इस परिसर में प्रवेश होता है। दर्शन के क्रम में पहले प्राचीन औदुंबर वृक्ष आता है। फिर कुछ दत्त श्रद्धालुओं की समाधियाँ आती हैं। आगे विशेष शैली की गौ-शिल्प मूर्ति और होमकुंड है। इसके आगे मंदिर स्थित है। मंदिर परिसर में मनोहर उद्यान विकसित किया गया है। इसमें सजावटी पेड़ और पुष्पवृक्ष लगे हैं। इनके कारण मंदिर का सौंदर्य और अधिक निखरता है। यह मंदिर भूमि से लगभग 7 से 8 फीट ऊँचाई पर स्थित है।
29 नवंबर 2003 को स्वामी गगनगिरी महाराज के हाथों इस मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया। मंदिर पर लगभग 5 किलो भार का स्वर्णकलश स्थापित किया गया। मंदिर की संरचना में विशाल सभामंडप और गर्भगृह सम्मिलित हैं। मूल मंदिर के आगे नया सभामंडप निर्मित किया गया है। मंदिर के प्रवेश द्वार से अंदर प्रवेश करने पर सबसे पहले कोंडाजी बाबा की समाधि दिखाई देती है। आगे गर्भगृह के प्रवेशद्वार पर श्री दत्त की पादुकाएँ रखी गई हैं। श्रद्धालुओं को गर्भगृह में प्रवेश की अनुमति नहीं है। इस कारण वे इन पादुकाओं के दर्शन करते हैं। गर्भगृह के प्रवेशद्वार के दोनों ओर द्वारपालों की मनोहर शिल्पाकृति है। गर्भगृह के भीतर स्वर्णजड़ित वज्रपीठिका में श्री दत्त की पाषाण मूर्ति प्रतिष्ठित है। इस मूर्ति को स्वर्णमुकुट और विभिन्न अलंकारों से सजाया गया है।
मंदिर परिसर में संत ज्ञानेश्वर महाराज, निवृत्ति महाराज, मुक्ताबाई और सोपानदेव की मूर्तियाँ स्थित हैं। स्वामी गगनगिरी महाराज और काशी से पधारे विद्वान रंगदास स्वामी के भी यहाँ छोटे मंदिर हैं। यहाँ कालभैरवनाथ का भी मंदिर है। यहाँ स्थित पीपल और नींबू के वृक्षों के नीचे अन्नपूर्णा देवी का स्थान है। उत्सव के समय देवी को नैवेद्य अर्पण करने की परंपरा है। मंदिर के समीप के परिसर में अनेक हनुमान वृक्षों का रोपण किया गया है। ये हनुमान वृक्ष दुर्लभ माने जाते हैं। आयुर्वेद में इनका प्रमुख महत्त्व बताया गया है।
मार्गशीर्ष पूर्णिमा को यहाँ दत्त जयंती का उत्सव धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन प्रातःकाल से ही पूजा, अभिषेक और कीर्तन आदि कार्यक्रम होते हैं। स्थानीय अभिलेख के अनुसार इस दिन 3 लाख से अधिक श्रद्धालु श्री दत्त के दर्शन हेतु उपस्थित होते हैं। श्रद्धालुओं की सुविधा हेतु संगमनेर से राज्य परिवहन की विशेष बसें चलाई जाती हैं। वैशाख शुक्ल द्वादशी और गुरुपूर्णिमा पर भी यहाँ उत्सव जैसा वातावरण रहता है। प्रत्येक गुरुवार और पूर्णिमा को यहाँ महाआरती होती है। इस आरती में भी हजारों श्रद्धालु उपस्थित रहते हैं। इन सभी दिनों में श्रद्धालुओं को देवस्थान ट्रस्ट की ओर से महाप्रसाद वितरित किया जाता है।
प्रतिदिन प्रातः 6 बजे से सायंकाल 8 बजे तक श्रद्धालु मंदिर में प्रवेश कर सकते हैं। वे श्री दत्त के दर्शन कर सकते हैं। प्रातः 7 बजे यहाँ आरती होती है। देवस्थान की ओर से श्रद्धालुओं के लिए ‘भक्तनिवास’ की सुविधा उपलब्ध करवाई गई है। यह देवस्थान महाराष्ट्र राज्य सरकार की तीर्थस्थान की ‘ब’ दर्जा प्राप्त सूची में सम्मिलित है। जिन देवस्थानों में हर साल 4 लाख से अधिक श्रद्धालु दर्शन हेतु आते हैं, उन्हें राज्य सरकार की ओर से तीर्थस्थान का ‘ब’ दर्जा दिया जाता है। इस दर्जा के अनुसार वहाँ आने वाले श्रद्धालुओं की सुविधाओं हेतु शासन की ओर से निधि उपलब्ध कराई जाती है।
विशेषताएँ:
संगमनेर से दूरी: 53 किमी, अहिल्यानगर से दूरी: 82 किमी
संगमनेर से राज्य परिवहन की सुविधा उपलब्ध है।
निजी वाहन सीधे मंदिर के वाहनतल तक जा सकते हैं।
श्रद्धालुओं के लिए ‘भक्तनिवास’ की सुविधा उपलब्ध है।