अहिल्यानगर जिले में गर्भगिरि पर्वत श्रृंखला की एक महान धार्मिक परंपरा है। राज्य के महत्वपूर्ण मंदिरों में से एक मोहटादेवी मंदिर इसी पर्वत श्रृंखला में स्थित है। कहा जाता है कि नाथ संप्रदाय का उदय इसी क्षेत्र में हुआ था। यह भूमि राष्ट्रीय संत तनपुरे महाराज, भगवान बाबा, भृंग ऋषि, वामनभाऊ, गव्हानेबाबा, खंडूजी बाबा आदि के चरण स्पर्श एवं निवास से पवित्र हुई है। ऐसी पवित्र भूमि में अहिल्यानगर तहसील के जेऊर गाँव में पर्वत श्रृंखला पर स्थित बायजाबाई मंदिर प्रसिद्ध है। इस मंदिर को जेऊर की आराध्य देवी माना जाता है।
पूर्व में गर्भगिरि पर्वत पर अनेक ऋषि-मुनि निवास करते थे। एक पौराणिक कथा के अनुसार गोरक्षनाथ ने इस पर्वत को स्वर्णमय बना दिया था। अब हालाँकि यह पर्वत स्वर्णमय नहीं है, लेकिन यहाँ स्थित बायजाबाई मंदिर नीचे से लेकर ऊपर तक स्वर्णमय है। इसलिए पर्वत पर स्थित यह मंदिर 5-7 कि.मी. की परिधि से आसानी से दिखाई देता है।
बायजाबाई अन्नपूर्णा देवी के नाम से भी प्रसिद्ध हैं। कहा जाता है कि इस देवी ने भूखे लोगों को भोजन कराया, इस कारण ही इस गाँव का नाम ‘जेऊर’ पड़ा। आज भी गाँव के लोग गाँव से गुजरने वाली सैकड़ों पालकियों को भोजन कराते हैं। चूँकि देवी को मनोकामना पूर्ण करने वाली माता के रूप जाना जाता है, इसलिए प्रतिदिन सैकड़ों श्रद्धालु देवी के दर्शन के लिए आते हैं।
मंदिर की जनश्रुति है कि बायजाबाई नाम की एक लड़की विवाह के बाद अपने ससुराल आई। एक दिन जब वह खेत में अपने ससुर के लिए भोजन लेकर जा रही थी, तो रास्ते में उसे कुछ सैनिक मिले। इन भूखे सैनिकों ने बायजाबाई से भोजन देने का अनुरोध किया। सैनिकों के अनुरोध पर बायजाबाई ने उन्हें अपने पास से सब्जी और रोटी दी। उसने सैनिकों के घोड़ों को भी खिलाया। सभी सैनिकों के जी भरकर खाने के बाद भी उसका भोजन बच जाता था। (मराठी में भोजन बच जाने को ‘जेवण उरले’ कहा जाता है। इन दो शब्दों को मिलाकर ही ‘जेऊर’ शब्द बना और इसी नाम से गाँव को जाना जाता है।) जब बहू यहाँ भोजन लेकर नहीं आई, तो उसके ससुर ढूँढ़ने लगे। भोजन लाने में देरी के कारण ससुराल वाले नाराज़ हो जाएँगे, इस डर से बायजाबाई पहाड़ में छुप गई। जब उसके ससुराल वाले उसे ढूँढ़ते हुए पहाड़ पर आए, तो वह पाषाणों में अदृश्य हो गई। कुछ साल बाद बायजाबाई ने गाँव वालों को दर्शन दिए और पहाड़ पर पाषाणों में एक मंदिर में मूर्ति स्थापित करने को कहा। उसके बाद गाँव वालों ने गर्भगिरी पहाड़ पर बायजाबाई का मंदिर बनवाया।
अहिल्यानगर जिले से छत्रपति संभाजीनगर जाते समय जेऊर गाँव पड़ता है। प्रकृति के बीच ऊँचे पहाड़ पर बने बायजाबाई मंदिर तक पहुँचने के लिए अब सड़क बन गई है। इसलिए, वाहन सीधे मंदिर की पार्किंग में जा सकते हैं। इसके अलावा, तलहटी से पुराना पैदल रास्ता भी है। यह मंदिर पहाड़ पर एक छोटे से पठार पर स्थित है।
कुछ सालों पहले किए गए जीर्णोद्धार के बाद, मंदिर ने अपना वर्तमान स्वरूप ले लिया है। मंदिर पर की गई अनूठी नक्काशी से इसकी खूबसूरती का पता चलता है। मंदिर का शिखर लगभग 90 पद ऊँचा है। भव्य शिखर की प्रत्येक परत पर अलग-अलग मूर्तियाँ हैं। यह मूर्तियाँ आंध्र प्रदेश के कुशल कारीगरों द्वारा बनाई गई हैं। दीवारों और छत को अनूठी कलाकृति से सजाया गया है और पूरे मंदिर को सुनहरे रंग में रंगा गया है। मंदिर एक सभामंडप और एक गर्भगृह से बना है। सभामंडप विशाल है और तीनों ओर श्रद्धालुओं के बैठने की व्यवस्था है। यह सभामंडप खुला है और चारों ओर आधी दीवारें हैं। सभामंडप से गर्भगृह में प्रवेश करते ही बायजाबाई की मनोहर मूर्ति दिखाई देती है। बायजाबाई की मूर्ति संगमरमर के गर्भगृह में स्थापित है। देवी का मुखौटा चांदी का है और उन्हें आभूषणों से सजाया गया है। वैशाख पूर्णिमा पर यहाँ होने वाला मेला प्रसिद्ध है। 3 दिनों तक चलने वाले इस मेले में 2 दिनों तक कुश्ती प्रतियोगिताएँ होती हैं। इस दौरान राज्य के कई प्रसिद्ध पहलवान इसमें भाग लेते हैं। मेले के लिए आने वाले श्रद्धालुओं को ग्रामीणों द्वारा बैंगन की सब्जी और रोटी का महाप्रसाद दिया जाता है। तीसरे दिन प्रवरासंगम से जल लाया जाता है और देवी का अभिषेक किया जाता है। दोपहर में पूरणपोली का भोग और महाआरती की जाती है। शाम को बायजाबाई के मुखौटे को पालकी में रखकर एक जुलूस निकाला जाता है।
प्रमुख विशेषताएँ
अहिल्यानगर से 17 कि.मी.
अहिल्यानगर से संभाजीनगर जाने वाली राज्य परिवहन बस का जेऊर में ठहराव है