महाराष्ट्र में देवी के साढ़े तीन शक्तिपीठों में से एक माहुरगढ़ पर रेणुका माता का अवतार मानी जाने वाली जगदंबा का मंदिर पाथर्डी तहसील में प्रसिद्ध है। मोहटागढ़ पर निवास करने वाली देवी के रूप में उन्हें ‘मोहटादेवी’ के नाम से जाना जाता है। यहाँ देवी की मूर्ति स्वयंभू है और श्रद्धालुओं का मानना है कि यह जागृत स्थान है। देवी का यह मंदिर महाराष्ट्र के प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है।
मंदिर की जनश्रुति है कि पहले इस स्थान पर सूखा पड़ा था, जिससे सभी लोग परेशान थे। तब दुनिया के कल्याण के लिए नवनाथ ने एक महायज्ञ किया और जगदंबा देवी की पूजा की। इसके लिए कई ऋषि-मुनियों को भी बुलाया गया था। इस महायज्ञ से देवी-देवता प्रसन्न हुए और वर्षा होने लगी। पूर्णाहुति समारोह के दौरान, यज्ञ कुंड में एक दिव्य शक्ति प्रकट हुई, वह थी महाशक्ति जगदंबा रेणुका माता। विधि-विधान से देवी की पूजा करने के बाद नवनाथ ने देवी से जगत कल्याण के लिए यहीं रहने का अनुरोध किया। उस समय देवी ने वचन दिया कि उचित समय आने पर वे पुनः प्रकट होकर यहीं निवास करेंगी। कुछ सालों के पश्चात वे जगदंबा के रूप में प्रकट हुईं और यहीं बस गईं। यही जगंदबा आगे चलकर मोहटादेवी के नाम से प्रसिद्ध हुईं।
एक अन्य कथा के अनुसार रेणुका माता के परम भक्त बंसी बाबा दहीफले प्रतिवर्ष श्री क्षेत्र माहुरगढ़ जाते थे। रेणुका माता की पूजा, अभिषेक, साड़ी और चोली चढ़ाने के पश्चात वे दो माह बाद मोहटा लौट आते थे। बाद में वृद्धावस्था के कारण उनके लिए पैदल यात्रा करना कठिन हो गया। उन्होंने रेणुका माता से प्रार्थना की, ‘माता, मुझे अपने से अलग मत होने देना।’ तभी एक दिन बाबा की गाय खो गई। काफी देर तक खोजने के पश्चात उन्होंने पाया कि गाय एक पहाड़ की चोटी पर है। जब बाबा ने पहाड़ पर जाकर देखा तो पाया कि गाय वहाँ दूध छोड़ रही थी। उन्होंने देखा तो वहाँ देवी का पाषाण रूप था। इसके बाद मोहटा गाँव वाले पैठण तीर्थ स्थल पर गए और कावड़ियों से गंगोदक लाकर उस तीर्थ से देवी का अभिषेक किया। वह दिन आश्विन शुक्ल एकादशी था।
बहुत पहले से आश्विन शुक्ल एकादशी को ग्रामीण और हज़ारों श्रद्धालु पैदल पैठण जाते हैं और कावड़ों में गंगा तीर्थ लाकर देवी का अभिषेक करते हैं। यह परंपरा आज भी जारी है। इस अभिषेक के बाद मोहटा देवी की पदयात्रा निकाली जाती है। इस समय मोहटा गाँव से मंदिर तक पालकी निकाली जाती है। इस पालकी की विशेषता यह है कि पालकी मार्ग पर हज़ारों महिलाएँ पालकी के आगे-आगे अपने पाँवों से सड़क साफ करती हैं। मोहटागढ़ में शारदीय नवरात्रि उत्सव उत्साह के साथ मनाया जाता है। श्रद्धालुओं की मान्यता है कि यह जागृत स्थान है और देवी को लगाई प्रार्थना पूर्ण होती है। इसलिए नवरात्रि उत्सव के दौरान हज़ारों महिलाएँ अपनी प्रार्थना पूरी करने के लिए यहाँ बैठती हैं।
इस गाँव के लोग दूध, दही और घी नहीं बेचते हैं। कहा जाता है कि मुगल काल में पड़ोसी गाँवों से कुछ भैंसें भूल से मोहटा गाँव में आ गईं। गाँव वालों ने उन्हें यह सोचकर यहाँ बाँध दिया कि भैंसों के मालिक आने पर उन्हें ले जाएँगे, लेकिन कई दिन बीत जाने के बाद भी भैंसों को लेने कोई नहीं आया। मुगल द्वारपालों को यह खबर पता चली, तो उन्होंने गाँव वालों को भैंस चोरी के आरोप में बंदी बनाने का आदेश दिया। अपनी त्रुटि न होने पर बंदी होने के भय से बचने के लिए उन्होंने मोहटा देवी से प्रार्थना की। ‘हम गाय-भैंसों का दूध-घी नहीं बेचेंगे और आपको अर्पित किए बिना खाएँगे भी नहीं, लेकिन कृपया इस समस्या का समाधान करें’. श्रद्धालुओं की पुकार मोहटा देवी ने सुन ली। अगले दिन जब द्वारपाल यहाँ आए, तो उन्होंने देखा कि सभी भैंसें सफेद हो गई थीं। द्वारपालों को अनुभव हुआ कि पिछले दिन उन्होंने जो भैंसें देखी थीं, वे यहाँ नहीं थीं। उन्होंने बंदी बनाने का आदेश रद्द कर दिया। तब से यहाँ के ग्रामीण दूध, दही और घी नहीं बेचते। न ही देवी को अर्पित किए बिना इन्हें खाते हैं।
मोहटा देवी मंदिर परिसर दस एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है। इस भव्य मंदिर का निर्माण देवी के श्रद्धालुओं द्वारा दिए गए दान से 25 करोड़ रुपए की लागत से हुआ है। इसके लिए राजस्थान के जैसलमेर से विशेष प्रकार के पाषाण लाए गए थे। दक्षिणी शैली में बने इस मंदिर में मुख्य कलश के साथ 25 से अधिक उप मंडप हैं। इसके अलावा इस मंदिर में विभिन्न देवी-देवताओं की 100 से अधिक मूर्तियाँ हैं।
मुख्य सभामंडप में दर्शन कतार की व्यवस्था की गई है और गर्भगृह में एक बड़े चौक पर मोहटादेवी की स्वयंभू मूर्ति स्थापित है। मंदिर परिसर में पाँच मंजिला इमारत में श्रद्धालुओं के रहने की जगह, भोजन कक्ष और मंदिर समिति का कार्यालय है।
कीर्तन और भजन जैसे कार्यक्रमों के लिए अलग से सभामंडप है। मंदिर में दिन में तीन बार आरती की जाती है। भक्त सुबह 5 बजे से रात 10 बजे तक मंदिर में आकर मोहटादेवी के दर्शन कर सकते हैं। यहाँ दोपहर 12:25 बजे से 2 बजे तक और शाम 7:45 बजे से 9 बजे तक श्रद्धालुओं को महाप्रसाद परोसा जाता है।
प्रमुख विशेषताएँ
पाथर्डी से 9 कि.मी., अहिल्यानगर से 61 कि.मी.
पाथर्डी बस स्टेशन से हर घंटे मंदिर के लिए बसें चलती हैं